‘‘संविधान जानो’’
‘‘संविधान जानो’’
‘‘संविधान जानो’’ अभियान को व्यापक और असरदार बनाने के लिए यह आवश्यक है कि संविधान को न केवल विधि से जोड़कर
देखा जाए बल्कि इससे भावनात्मक रूप से भी जुड़े। भावनात्मक रूप से जुड़ने के लिए
संविधान से सम्बन्धित रोचक तथ्य जैसे कि अंग्रेजी भाषा में सुलेखन का कार्य प्रेम
बिहारी नारायण रायजादा द्वारा किया गया एवं हिन्दी भाषा में बसन्त कृष्ण वैद्य
द्वारा सुलेखन का कार्य किया गया, सभी
को मालूम होने चाहिए।
साथ ही संविधान को खूबसूरत एवं आकर्षक बनाने के लिए सभी पृष्ठों पर
चौखट (फ्रेम) का कार्य आचार्य नन्दलाल बोस द्वारा किया गया एवं संविधान के 22
भागों को भारतीय सभ्यता से सम्बन्धित महत्वपूर्ण एवं सारगर्भित विषयों का चित्रण
स्वयं नन्द लाल बोस द्वारा किया गया। इन चित्रों जैसे : वैदिककाल, रामायण, महाभारत, अशोक, भागीरथ, छत्रपति शिवाजी महाराज, गुरूगोविन्दसिंह, महात्मा गांधी, नेताजी
सुभाषचन्द्र बोस आदि के माध्यम से आज के भारत को न केवल संविधान सभा की दूरदर्शिता
से जुड़ाव होगा बल्कि भारतीय संस्कृति, सभ्यता
और विरासत के महत्वपूर्ण आयामों की जानकारी भी सरल एवं सहज रूप से मिलेगी। राजस्थान
विधान सभा में संविधान दीर्घा संविधान में मूल संविधान में उकेरी कलाकृतियों और संविधान सभा
में राजस्थान की भागीदारी विषय पर प्रकाश डालती है l
युवा पीढ़ी को ‘‘संविधान जानो’’ अभियान से जोड़ने के उद्देश्य में यह
संदेश भी होना चाहिए कि हर पीढ़ी को एक दायित्व मिलता है। जिस प्रकार संविधान सभा
ने अपने युग में क्रांतिकारी निर्णय लिये जैसे : सभी को मताधिकार, अस्पृश्यता का अन्त, महिलाओं को समानता का अधिकार, बालश्रम का निषेध, उपाधियों का अन्त आदि।
इसी प्रकार आज के युवा को दायित्वो का एहसास होना चाहिए कि कुछ
निर्णय अभी लम्बित है। जैसे : पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर को पूरी तरह से भारत में
मिलाना, समान सिविल संहिता आदि। कई विषय है जिन पर
वैकल्पिक व्यवस्था पर विचार किया जाना है जैसे : विधायिका में न्यूनतम शैक्षणिक
योग्यता, विद्यालय एवं महाविद्यालयों में अनिवार्य रूप
से एनसीसी की तर्ज पर प्रशिक्षण आदि। कुछ विषय जो कि संविधान में लिखे हुए है
परन्तु जिनका क्रियान्वयन बहुत कमजोर या नगण्य रहा है जैसे : राजभाषा हिन्दी की
स्वीकार्यता एवं प्रचार-प्रसारण, उच्च
न्यायालयों में राजभाषा या हिन्दी में प्रभावी कार्यवाही का अभाव, शिक्षा का अधिकार अधिनियम में संवैधानिक
नैतिकता की कसौटी के मापदण्डों पर पूर्ण तरह शिथिल एवं कमजोर पाया जाता
है।न्यायपालिका द्वारा विश्वास, धर्म
और उपासना की स्वतंत्रता के साथ-साथ विचार, अभिव्यक्ति
की स्वतंत्रता के मध्य एक संतुलित लक्ष्मणरेखा खिंचने के साथ ही भारत की एकता और
अखण्डता का सर्वोपरि रखने की जिम्मेदारी का भान न केवल भारत के नागरिकों को हो
बल्कि न्यायिका प्रक्रिया से जुड़े सभी संस्थाओं को भी हो।
संविधान को बनाने में 299 लोगों की भूमिका रही थी, परन्तु सीधे रूप से दो दर्जन समितियों के
माध्यम से संविधान का मसौदा तैयार किया गया। अतः इन सभी समितियों के अध्यक्षों एवं
सदस्यों के बारे में संक्षिप्त जानकारी पाठ्यक्रम का अनिवार्य रूप से अभिन्न अंग
हो। जिससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया का उदाहरण स्वतः ही सिद्ध हो। सभी समितियों
द्वारा बनाये गये रिपोर्ट को प्रारूपण समिति के अध्यक्ष डॉ. भीमराव रामजी अम्बेड़कर द्वारा संविधान सभा में प्रारूप
संविधान के रूप में संविधान सभा में पेश किया गया। जिस पर लम्बी बहस, तर्क, चर्चा
और सबकी सहमति के बाद हमारा संविधान बना जिसको 26 नवम्बर 1949 को हम भारत के लोगों
द्वारा अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मसमर्पित किया।
‘‘संविधान जानो’’ अभियान में भारत के राष्ट्रीय नीति वाक्य ‘‘सत्यमेव
जयते’’ एवं यतो धर्मस्ततो जयः जो कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय का नीति वाक्य है, पर विद्यालयों एवं महाविद्यालयों में निबन्ध
लेखन प्रतियोगिता के साथ-साथ वाद-विवाद का विषय भी होना चाहिए,
जिससे भारतीय संस्कृति का दृष्टिकोण-एकम् सद
बहुधा विप्र वदंति पर समग्र चिंतन एवं सेकुलरिज्म- पंथनिरपेक्षता की सही समझ और परख युवा पीढ़ी को मिल सके।
संविधान सभा की मूल भावना, को आमजन तक पहुचाने में राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण
और डॉ अम्बेडकर यूनिवर्सिटी अहम भूमिका निभा सकते
हैं l
सूर्य प्रताप सिंह राजावत
संविधान विशेषज्ञ,
अधिवक्ता राजस्थान उच्च न्यायालय जयपुर

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