भारतीय राष्ट्रवाद, संवैधानिक नैतिकता और राष्ट्रगीत ‘वन्दे मातरम्’ का संवैधानिक स्थान
भारतीय राष्ट्रवाद , संवैधानिक नैतिकता और राष्ट्रगीत ‘वन्दे मातरम्’ का संवैधानिक स्थान भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का गहन अध्ययन करने पर स्पष्ट होता है कि उसमें राष्ट्रवाद की एक नहीं , बल्कि अनेक वैचारिक धाराएँ समानांतर रूप से विकसित हुईं। यद्यपि ‘भारत माता’ सभी के लिए राष्ट्रीय चेतना का साझा प्रतीक थी , तथापि उसकी परिभाषा , आशय और दार्शनिक व्याख्या विभिन्न विचारकों के यहाँ भिन्न-भिन्न रूपों में अभिव्यक्त हुई। प्रथम दृष्टि हमें श्रीअरविंद के राष्ट्रवाद में मिलती है। उनके लिए भारत केवल एक भौगोलिक इकाई या राजनीतिक राज्य नहीं , बल्कि एक जीवंत आध्यात्मिक सत्ता है। श्रीअरविंद भारत राष्ट्र को माता तथा जगज्जननी के रूप में देखते हैं। उनके चिंतन में राष्ट्रभक्ति केवल राजनीतिक कर्तव्य नहीं , बल्कि आध्यात्मिक साधना है। भारत माता की सेवा उनके लिए ईश्वर की सेवा के समान है।दूसरी धारा लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के राष्ट्रवाद में दिखाई देती है। तिलक भारतीय संस्कृति , सभ्यता , इतिहास और धर्म को राष्ट्रजीवन का आधार मानते हैं। उनका प्रसिद्ध उद्घोष—“स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँ...