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भारतीय शहरी विकास और लोकहित याचिका : संवैधानिक न्याय की नई दिशा

  भारतीय शहरी विकास और लोकहित याचिका : संवैधानिक न्याय की नई दिशा लोकहित याचिका को भारतीय न्यायपालिका का एक नवाचार माना जाता है , जिसमें वाद-हेतु( Locus Standi ) की कठोरता को इस उद्देश्य से शिथिल किया गया कि उन लोगों की शिकायतों का समाधान किया जा सके , जो अशिक्षा अथवा आर्थिक दुर्बलता के कारण न्यायालय तक पहुँचने में सक्षम नहीं हैं भारत में लोकहित याचिका के आधुनिक न्यायशास्त्र का प्रारंभ 1979 के हुसैनारा खातून बनाम गृह सचिव , बिहार सरकार , (1980), मामले से माना जाता है। इस मामले में विचाराधीन कैदियों की दयनीय स्थिति , शीघ्र सुनवाई के अधिकार और विधिक सहायता जैसे प्रश्नों को न्यायालय के समक्ष व्यापक जनहित के रूप में उठाया गया। इसके पश्चात् एस. पी. गुप्ता बनाम भारत संघ , (1981)   के माध्यम से लोकहित याचिका के क्षेत्र में लोकस स्टैंडी के सिद्धांत का और अधिक विस्तार हुआ।   इसी प्रकार , भारत के संविधान का मूल संरचना सिद्धांत (Basic Structure Doctrine) (केशवानंद भारती मामला , 1973) विश्व के विधि-न्यायशास्त्र में अत्यंत नवीन , मौलिक और प्रभावी रचनात्मक साधनों में से एक माना जाता...

संविधान स्याही से नहीं, रक्त से लिखा जाता है: संवैधानिक नैतिकता और संस्थागत गरिमा

  संविधान स्याही से नहीं , रक्त से लिखा जाता है: संवैधानिक नैतिकता और संस्थागत गरिमा हाल के दिनों में निर्वाचन आयोग चर्चा में है और यह प्रकरण संस्था की छवि तथा उसकी वैधता को कमजोर करने के प्रयासों के संदर्भ में सामने आया है। यह पूरा प्रकरण हमें स्मरण कराता है कि शांति की नैतिकता , युद्ध की नैतिकता और संविधान की नैतिकता—इन तीनों को सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा होना चाहिए।दुर्भाग्यवश , यह विवाद द इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित एक रिपोर्ट के बाद उत्पन्न हुआ , जिसमें निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी के कथित विचारों के संबंध में यह कहा गया कि निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली और निर्णय-प्रक्रिया में लोकतांत्रिकता का अभाव था। दो निर्वाचन आयुक्तों को इस बात का लाभ नहीं दिया जा सकता कि उन्हें असहमति व्यक्त करने का तरीका ज्ञात नहीं था , क्योंकि असहमति व्यक्त करने का तरीका और उसके लिए चुना गया समय दोनों ही महत्वपूर्ण होते हैं। किंतु गोपनीय पत्राचार को मीडिया के साथ साझा करना किसी व्यक्ति का नहीं , बल्कि पूरी संस्था का मीडिया ट्रायल आमंत्रित करने के समान है।यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण...

The Constitution Is Written Not in Ink, but in Blood: Constitutional Morality and Institutional Dignity

  The Constitution Is Written Not in Ink, but in Blood: Constitutional Morality and Institutional Dignity Recently, the Election Commission has been in the news, and the episode has emerged in the context of attempts to undermine the image and legitimacy of the institution. This entire episode reminds us that the morality of peace, the morality of war, and the morality of the Constitution need to be made part of public discourse. Unfortunately, the controversy arose following a report published in The Indian Express regarding the alleged views of Election Commissioners Dr. Sukhbir Singh Sandhu and Dr. Vivek Joshi, suggesting that the functioning and decision-making of the Election Commission suffered from a lack of democracy. The two Election Commissioners cannot be given the benefit of not knowing how dissent ought to be expressed, because both the manner of expressing disagreement and the timing of such expression are important. However, sharing confidential correspondence with ...

भारत में राजभाषा हिन्दी का ऐतिहासिक चिंतन और संविधान सभा का निर्णय

  भारत में राजभाषा हिन्दी का ऐतिहासिक चिंतन और संविधान सभा का निर्णय भारत में एक ऐसी भाषा की आवश्यकता का चिंतन , जो विभिन्न भाषायी , सांस्कृतिक और प्रादेशिक समुदायों को परस्पर जोड़ सके , आधुनिक भारतीय राष्ट्रवाद के उदय के साथ ही स्पष्ट रूप से सामने आने लगा था। राष्ट्रभाषा अथवा ऐसी संपर्क-भाषा की कल्पना केवल प्रशासनिक सुविधा का प्रश्न नहीं थी , बल्कि इसे राष्ट्रीय एकता , सांस्कृतिक आत्मबोध और स्वाधीनता की चेतना से भी जोड़ा गया। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध से लेकर संविधान सभा के निर्णय तक इस प्रश्न पर देश के अनेक चिंतकों , साहित्यकारों और राष्ट्रवादियों ने विचार किया। सन् 1874 में आधुनिक भारत के प्रमुख सुधारक केशवचंद्र सेन की पत्रिका ‘ सुलभ समाचार’ में भारत के लिए एक राष्ट्रभाषा की आवश्यकता का विचार दिखाई देता है। इसी वैचारिक क्रम को बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने अपने साहित्य और लेखन के माध्यम से आगे बढ़ाया। आनन्द मठ के रचयिता बंकिमचंद्र के लिए राष्ट्र केवल राजनीतिक इकाई नहीं था ; वह सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रीय आत्मसम्मान से निर्मित एक जीवंत अवधारणा था। भाषा को इस राष्ट्र...