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मतदाता सूचियाँ, निर्वाचन आयोग और प्रमाण-आधारित सार्वजनिक विमर्श : तथ्य, आरोप और कानून

  मतदाता सूचियाँ , निर्वाचन आयोग और प्रमाण-आधारित सार्वजनिक विमर्श : तथ्य , आरोप और कानून निर्वाचन आयोग के कामकाज से संबंधित प्रश्नों का परीक्षण संविधान , कानून , नियम , आधिकारिक अभिलेख , न्यायिक निर्णय और उपलब्ध प्रमाणों की कसौटी पर किया जाना चाहिए। मतदाता सूचियों , निर्वाचन आयुक्तों , मतदाता विवरणों और तकनीक को लेकर प्रश्न उठते हैं। इसलिए तथ्यों , लगाए गए आरोपों , कानूनी स्थिति और उपलब्ध प्रमाणों को स्पष्ट रूप से अलग-अलग समझना आवश्यक है। तथ्य : मतदाता सूची की शुद्धता - मतदाता सूची की शुद्धता स्वयं एक वैधानिक आवश्यकता है। Representation of the People Act, 1950 में मतदाता के पंजीकरण , सामान्य निवास , एक से अधिक स्थानों पर पंजीकरण तथा त्रुटिपूर्ण या अपात्र प्रविष्टियों के सुधार और विलोपन से संबंधित व्यवस्था है। धारा 19 पंजीकरण का आधार प्रदान करती है। कानून एक व्यक्ति के एक से अधिक निर्वाचन क्षेत्रों में अथवा एक ही निर्वाचन क्षेत्र में एक से अधिक बार पंजीकरण को रोकता है। धारा 22 के अंतर्गत प्रविष्टि के संशोधन , स्थानांतरण या विलोपन से पहले उचित सत्यापन की आवश्यकता है। अतः अपात्र ...

भारतीय शहरी विकास और लोकहित याचिका : संवैधानिक न्याय की नई दिशा

  भारतीय शहरी विकास और लोकहित याचिका : संवैधानिक न्याय की नई दिशा लोकहित याचिका को भारतीय न्यायपालिका का एक नवाचार माना जाता है , जिसमें वाद-हेतु( Locus Standi ) की कठोरता को इस उद्देश्य से शिथिल किया गया कि उन लोगों की शिकायतों का समाधान किया जा सके , जो अशिक्षा अथवा आर्थिक दुर्बलता के कारण न्यायालय तक पहुँचने में सक्षम नहीं हैं भारत में लोकहित याचिका के आधुनिक न्यायशास्त्र का प्रारंभ 1979 के हुसैनारा खातून बनाम गृह सचिव , बिहार सरकार , (1980), मामले से माना जाता है। इस मामले में विचाराधीन कैदियों की दयनीय स्थिति , शीघ्र सुनवाई के अधिकार और विधिक सहायता जैसे प्रश्नों को न्यायालय के समक्ष व्यापक जनहित के रूप में उठाया गया। इसके पश्चात् एस. पी. गुप्ता बनाम भारत संघ , (1981)   के माध्यम से लोकहित याचिका के क्षेत्र में लोकस स्टैंडी के सिद्धांत का और अधिक विस्तार हुआ।   इसी प्रकार , भारत के संविधान का मूल संरचना सिद्धांत (Basic Structure Doctrine) (केशवानंद भारती मामला , 1973) विश्व के विधि-न्यायशास्त्र में अत्यंत नवीन , मौलिक और प्रभावी रचनात्मक साधनों में से एक माना जाता...

संविधान स्याही से नहीं, रक्त से लिखा जाता है: संवैधानिक नैतिकता और संस्थागत गरिमा

  संविधान स्याही से नहीं , रक्त से लिखा जाता है: संवैधानिक नैतिकता और संस्थागत गरिमा हाल के दिनों में निर्वाचन आयोग चर्चा में है और यह प्रकरण संस्था की छवि तथा उसकी वैधता को कमजोर करने के प्रयासों के संदर्भ में सामने आया है। यह पूरा प्रकरण हमें स्मरण कराता है कि शांति की नैतिकता , युद्ध की नैतिकता और संविधान की नैतिकता—इन तीनों को सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा होना चाहिए।दुर्भाग्यवश , यह विवाद द इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित एक रिपोर्ट के बाद उत्पन्न हुआ , जिसमें निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी के कथित विचारों के संबंध में यह कहा गया कि निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली और निर्णय-प्रक्रिया में लोकतांत्रिकता का अभाव था। दो निर्वाचन आयुक्तों को इस बात का लाभ नहीं दिया जा सकता कि उन्हें असहमति व्यक्त करने का तरीका ज्ञात नहीं था , क्योंकि असहमति व्यक्त करने का तरीका और उसके लिए चुना गया समय दोनों ही महत्वपूर्ण होते हैं। किंतु गोपनीय पत्राचार को मीडिया के साथ साझा करना किसी व्यक्ति का नहीं , बल्कि पूरी संस्था का मीडिया ट्रायल आमंत्रित करने के समान है।यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण...