संविधान स्याही से नहीं, रक्त से लिखा जाता है: संवैधानिक नैतिकता और संस्थागत गरिमा
संविधान स्याही से नहीं , रक्त से लिखा जाता है: संवैधानिक नैतिकता और संस्थागत गरिमा हाल के दिनों में निर्वाचन आयोग चर्चा में है और यह प्रकरण संस्था की छवि तथा उसकी वैधता को कमजोर करने के प्रयासों के संदर्भ में सामने आया है। यह पूरा प्रकरण हमें स्मरण कराता है कि शांति की नैतिकता , युद्ध की नैतिकता और संविधान की नैतिकता—इन तीनों को सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा होना चाहिए।दुर्भाग्यवश , यह विवाद द इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित एक रिपोर्ट के बाद उत्पन्न हुआ , जिसमें निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी के कथित विचारों के संबंध में यह कहा गया कि निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली और निर्णय-प्रक्रिया में लोकतांत्रिकता का अभाव था। दो निर्वाचन आयुक्तों को इस बात का लाभ नहीं दिया जा सकता कि उन्हें असहमति व्यक्त करने का तरीका ज्ञात नहीं था , क्योंकि असहमति व्यक्त करने का तरीका और उसके लिए चुना गया समय दोनों ही महत्वपूर्ण होते हैं। किंतु गोपनीय पत्राचार को मीडिया के साथ साझा करना किसी व्यक्ति का नहीं , बल्कि पूरी संस्था का मीडिया ट्रायल आमंत्रित करने के समान है।यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण...