महाभियोग को बनाया दबाव बनाने और प्रतिशोध का एक साधन
महाभियोग को बनाया
दबाव बनाने और प्रतिशोध का एक साधन
आज भारत राजनीति में गिरावट, राजनीतिक पार्टियों में संवैधानिक नैतिकता के
पतन और भारत के लोगों के प्रतिनिधियों के पतन का गवाह बन रहा है।सुप्रीम कोर्ट के
फैसले का इंतज़ार किए बिना 100 सांसदों द्वारा मद्रास हाई कोर्ट के जस्टिस जी.आर.
स्वामीनाथन के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाना, भारत के संविधान में अविश्वास,
न्यायपालिका में भरोसे की कमी और लोकतंत्र के
तीसरे स्तंभ, न्यायपालिका
को धमकाने और प्रतिशोध लेने का एक हथियार बनाया है।
यह मामला अरुलमिघु सुब्रमण्य
स्वामी मंदिर के प्रबंधन और दरगाह प्रबंधन समिति के बीच है। मूल रूप से यह मुद्दा
संपत्ति जो कि थिरुप्परंकुंद्रण पहाड़ी पर स्थित है पर नागरिक अधिकारों से संबंधित है, जिस पर 1923 में
ही प्रिवी काउंसिल द्वारा घोषणा और निषेधाज्ञा का मुकदमा निर्णित हो गया था ।
मद्रास उच्च न्यायालय ने 1996 के आदेश में मुस्लिम समुदाय की सीमांकित भूमि से कम
से कम 15 मीटर की दूरी पर दीपक जलाने की अनुमति दी गई
है। 2005 में शांति समिति के प्रस्ताव में भी इसे
मान्यता दी गई थी। चूंकि यह मुद्दा अरुलमिघु सुब्रमण्य स्वामी मंदिर के प्रबंधन और
दरगाह प्रबंधन समिति के बीच है, इसलिए
जो एक पक्ष के लिए पवित्र और पावन है, वह
दूसरे पक्ष के लिए समान नहीं हो सकता है। उदाहरण के लिए, अक्टूबर 2025 में
उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप से दरगाह में पशु बलि के प्रयास पर रोक लगा दी गई थी।
याचिका में बताई गई घटनाओं का क्रम, भारत में आपसी भाईचारे के लिए कुछ बातें एकदम साफ़ कर देता है कि
दोनों समुदायों को शांति से साथ चाहिए, लेकिन
नागरिक अधिकारों की कुर्बानी की कीमत पर नहीं। संवैधानिक नैतिकता के दायरे में
सांप्रदायिक सद्भाव के नाम पर रीति-रिवाजों और परंपराओं से समझौता नहीं किया जाना
चाहिए। एक और महत्वपूर्ण पहलू इसमें शामिल है, वह
है भक्तों की भूमिका और कर्तव्य, जहाँ
धार्मिक संस्था के ट्रस्टी वैध पारंपरिक प्रथाओं को निभाने और संरक्षित करने में
विफल रहते हैं। यह रिट याचिका भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत मंदिर के प्रबंधन को निर्देश देने के
लिए दायर की गई थी कि वे दीपाथून नामक पत्थर के मंदिर के खंभे पर कार्तिगई दीपम
जलाएँ जो कि दरगाह से 50
मीटर दूर स्थित है और न्यायिक आदेश की अनुमति से तीन गुना दूर है।
याचिकाकर्ता ने मंदिर प्रबंधन के कार्तिगई दीपम को अलग जगह पर जलाने के निर्देशों
को चुनौती दी। याचिकाकर्ता की प्रार्थना को लोकस स्टैंडी, रेस ज्यूडिकाटा, पूजा स्थल अधिनियम जैसी आपत्तियों पर सम्पूर्ण विचार करने के बाद स्वीकार कर लिया गया। कोर्ट
ने मंदिर प्रबंधन/देवस्थानम को निर्देश दिया कि वे सामान्य स्थानों के अलावा
दीपाथून पर भी कार्तिगई दीपम जलाएँ और पुलिस को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया
कि इस कोर्ट के निर्देशों का पालन किया जाए। लेकिन कोर्ट के निर्देशों का पालन
केवल अवमानना याचिका दायर करने और कोर्ट द्वारा CISF कर्मियों की टीम को याचिकाकर्ता और उसके दस साथियों को सुरक्षा प्रदान करने और कोर्ट के
आदेश को लागू करने के निर्देश देने के बाद ही किया गया। यह बताना ज़रूरी है कि
दरगाह कमेटी ने उस आदेश के खिलाफ अपील दायर नहीं की है जिसे लागू किया जाना है। राज्य सरकार ने विवादित आदेश के खिलाफ सुप्रीम
कोर्ट में अपील दायर की है। भक्त याचिकाकर्ता ने खुद दीपक जलाने का दावा नहीं किया
था, बल्कि
वह चाहता था कि मंदिर ट्रस्ट उन परंपराओं को बनाए रखे जो प्रागैतिहासिक काल से
जुड़ी हैं। जब मंदिर ट्रस्ट ने आदेशों का पालन नहीं किया,
तब सांप्रदायिक सद्भाव को ध्यान में रखते हुए
केवल दस लोगों को दीपक जलाने की अनुमति दी गई, जो दरगाह से
तयशुदा दूरी से
तीन गुणा दूरी पर है।घटनाओं को देखते हुए
कई सवाल खड़े होते हैं ,
यह भारत के संविधान की योजना,
आलोच्य आदेश के खिलाफ लंबित अपील ,
साथ ही हाई कोर्ट के आदेश का पालन करने के लिए
सरकारी कर्मचारियों के संवैधानिक और वैधानिक कर्तव्यl अन्तोगत्वा ,
केंद्र सरकार की CISF
एजेंसी ने आदेश का पालन करवाया,
जिससे कानून के शासन को बनाए रखा गया।
तमिलनाडु राज्य का यह अवज्ञापूर्ण कार्य तमिलनाडु के मुख्यमंत्री
द्वारा संविधान की गरिमा को बनाए रखने के लिए ली गई शपथ के अक्षर और भावना का
उल्लंघन है। यह इस बात पर भी ज़ोर देता है कि राज्य का नौकरशाही तंत्र न्यायपालिका
के कानूनी आदेशों और उच्च अधिकारी के अवैध आदेशों और उनके परिणामों के बीच अंतर को
समझने में विफल रहा। यह संविधान के प्रति अनादर और राजनीतिक दलों की हताशा को
दर्शाता है कि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में
लंबित आदेश पर अंतिम फैसले का इंतजार किए
बिना महाभियोग प्रस्ताव का विकल्प चुना । निष्कर्ष के तौर पर, यह देश के लिए अच्छा संकेत नहीं है जहाँ एक
राजनीतिक विचारधारा संवैधानिक अदालत द्वारा न्यायिक फैसले पर असंतोष व्यक्त करती
है, उस जज पर दुराचार और अक्षमता का आरोप लगाया जो भारत के संविधान के दायरे में फैसला सुनाता
है। यह कहना कि यह विवाद धार्मिक प्रकृति का है, गुमराह करने वाला है। इसका इस्तेमाल मीडिया में अफवाहें फैलाने और
वोट बैंक को खुश करने के लिए एक हथियार के तौर पर किया जा रहा है। लोकसभा अध्यक्ष
को महाभियोग प्रस्ताव पर संज्ञान लेने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि यह प्रस्ताव
न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संवैधानिक लोकतंत्र का उल्लंघन है।
सूर्य प्रताप सिंह राजावत
अधिवक्ता
राजस्थान उच्च न्यायालय जयपुर
समाचार पत्र राष्ट्रदूत में प्रकाशित दिनांक 18 दिसम्बर 2025

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