सात्विक गुणों के अहंकार के चक्रव्यूह को समझते थे वीर सावरकर

 

सुन्दरकाण्ड में भगवान श्रीराम के परमभक्त वीर हनुमानजी द्वारा अशोक वाटिका को नष्ट करते देख लंकापति रावण ने कई वीरों को हनुमानजी को बंदी बनाकर लाने को भेजा था। हनुमान जी सभी प्रकार के शस्त्रों को नष्ट करने में सक्षम थे परन्तु मेघनाथ द्वारा ब्रह्मशास्त्र चलाने पर उस शस्त्र के स्वामी ब्रह्माजी  के सम्मान के लिए स्वयं को बंदी बना लिया था। बंदी बनाकर जब हनुमानजी को रावण के दरबार में ले जाया गया था तब रास्ते में लंकावासी बच्चे हनुमानजी को अपमानित कर रहे थे, रामचरित मानस में अंकित है कि उन्हें पैरों से लात मार कर नीचा दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे। परन्तु वीर हनुमान जी ने इस व्यवहार के प्रति संयम और धैर्य बनाये रखा और सही समय पर लंका को आग लगा दी थी।

इसी प्रकार वीर सावरकर द्वारा जेल से आजादी के लिए माफी की अर्जी (mercy petition)को देखना चाहिए। हनुमान जी के लिए उनके आराध्य देवता श्रीराम थे तो वीर सावरकर के लिए भारत माता आराध्य देवी थी। हनुमान जी ने स्वयं को अपमानित होने को स्वीकार किया क्योंकि वह आचरण उनके लक्ष्य के लिए उन परिस्थितियों में श्रेष्ठतम था। उसी प्रकार वीर सावरकर द्वारा मर्सी पिटिसन (mercy petition) व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं थी परन्तु भारत की आजादी के लिए उनका उस कारावास से बहार निकलना उन परिस्थितियों में आवश्यक थी, बल्की कर्त्तव्य  था, युगधर्म था। सर्ववदित है कि वीर सावरकर के जेल से बहार आने के बाद उनकी योजना के अंतर्गत सामाजिक कार्य जैसे छुआछूत का विरोध ,दलितों को मंदिर में प्रवेश जैसे सामाजिक जन जागरण में अहम भूमिका रही। वीर सावरकर सात्विक अहंकार एवं स्वयं के गुणों के गुणगान के अपेक्षा भारत की आजादी के लिए नैतिक सात्विक आदर्शों का त्याग, उच्चतर लक्ष्य के लिए ,कभी भी उनके कमजोरी का कारण नहीं बन पाया। भारत को कभी भी नहीं भूलना चाहिए कि यदि वीर सावरकर द्वारा भारतीयों को शस्त्र प्रशिक्षण के लिए ब्रिटिश फौज से जुड़ने के कारण ही भारत के विभाजन के समय बर्बरता, हिंसा का सामना भारत कर सका अन्यथा भारत की नियती में कुछ और ही होता। राष्ट्र पुरूष, राष्ट्र प्रवर्तक, युग पुरूष के आचरण, व्यवहार, निर्णय, लेखनी, वचन, वाणी आदि को समझने के लिए इतिहास का ज्ञान, इतिहास के अनुभव के साथ शास्त्रों की समझ अनिवार्य है। प्रेयस  और श्रेयस का भेद जानना आवश्यक है। उक्त कसौटी पर विवेचन का सामना करने का साहस कम ही होता है क्योंकि सत्य बहुत कटु होता है।

 

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