महाराणा प्रताप --स्वधर्म और स्वराज के प्रतीक

  
महाराणा प्रताप&स्वधर्म और स्वराज के प्रतीक

हल्दीघाटी में महाराणा प्रताप और अकबर के बीच युद्ध के निर्णय को लेकर आज तक चर्चा हो रही है। युद्ध में किसकी हार हुई\ किसकी जीत\ इस पर विद्वान इतिहासकारों का एक मत क्यों नहीं बन पा रहा\ यह समझ से परे है जबकि युद्ध की घटना\ युद्ध में पहले आक्रमण किसने किया\ युद्ध में सेना की क्षमता किसकी ज्यादा थी\ युद्ध में पीछे कौन हटा\ पीछे हटना क्या युद्ध में रणनीति का भाग नहीं होता\ युद्ध की नैतिकता सामान्य परिस्थितियां की नैतिकता में भिन्नता होती है। इस पर कोई दो राय नहीं है। 

युद्ध में कौन जीता और कौन हारा इसका आंकलन इस बात से लगाया जा सकता है कि किस प्रकार उस युद्ध ने भविष्य को नई दिशा दी। भारत के इतिहास में महाराणा प्रताप को स्वधर्म और स्वराज के लिए जीवन त्यागने वाले योद्धा के रूप में उदाहरण प्रस्तुत किया। जो कि तत्कालिक परिस्थितियों में भारतीय राष्ट्रीयता और विदेशी हुकुमत के विरूद्ध संघर्ष के लिए प्रेरणा का स्त्रोंत उभर कर आया है।

स्वधर्म और स्वराज के सिद्धांत को शिवाजी और गुरू गोविन्द सिंह जी ने अपने जीवन का आधार बना मुगल साम्राज्य के विरूद्ध शंखनाद किया था। वीर सावरकर की पुस्तक में लिखा है कि इसी सिद्धांत से भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम 1857 प्रेरित था।
वीर  सावरकर ने 1857 के विद्रोह को भारतीय स्वतंत्रता का पहला युद्ध कहा था। उन्होंने 1909 में “भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास” नामक पुस्तक लिखी थी। यह मूल रूप से मराठी में लिखी गई थी जिसे ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्ध  किया गया था ।वीर सावरकर लिखते हैं कि  इतिहास लेखन में घटनाओं के पीछे सिद्धांतों पर दृष्टि होनी चाहिए विमर्श  को इतिहास का दर्जा नहीं  देना चाहिए जैसा कि 1857 में ब्रिटीश के विरुद्ध भारतीय आक्रोश को  ग़दर-म्युटिनी कहा गया जो की ब्रिटीश समर्थित विमर्श से ज्यादा कुछ नही है |जबकि इतिहास लेखन की दृष्टि से 1857 के विद्रोह को भारतीय स्वतंत्रता का पहला युद्ध कहना तथ्यपरक और सिद्धान्तिक रूप से युद्ध ही था | इसके समर्थन में वीर सावरकर लिखते हैं कि जो सीता अपहरण को राम रावण युद्ध का कारण  और कारतूस में गौ मॉस और सूअर के मॉस को 1857 के विद्रोह का कारण बताते हैं वह विमर्श और इतिहास लेखन में अंतर नहीं  जानते है| वीर सावरकर लिखते हैं कि  स्वधर्म और स्वराज के सिद्धांत राम रावण युद्ध और 1857 के विद्रोह के  कारण बने थे |इसी प्रकार डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के पुत्र राजीव नैन प्रसाद की पुस्तक ‘‘राजा मानसिंह ऑफ आमेर’’  मध्यकालीन भारत में राजा मान सिंह की भूमिका पर गहन शोध है कि किस प्रकार राजनैतिक संधि कर भारत को धर्मांतरण की आंधी से बचाया।

नरम दल हो या गरम दल भारत के स्वतंत्रता संग्राम में स्वधर्म और स्वराज के लिए ही विदेशी हुकुमत के विरूद्ध आंदोलन हुआ था। अंतिम उद्देश्य सभी का भारत की स्वतंत्रता थी। किसी को विलम्ब से तो किसी को अविलम्ब स्वतंत्रता चाहिए थी।

स्वधर्म और स्वराज के लिए भगत सिंह] राजगुरू और सुखदेव ने सहर्ष फांसी की सजा स्वीकार की। महात्मा गांधी ने इस विषय पर हिन्द स्वराज नाम की पुस्तक में अपने विचार रखें। श्री अरविन्द ने बंगाल विभाजन के विरोध के लिए स्वराज एवं स्वदेशी का नारा दिया। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस स्वधर्म और स्वराज प्राप्ति के लिए भारत से बाहर रहकर भारत को आजाद कराने के लिए संघर्षरत थे। इसका चित्रण भारत के हस्तलिखित संविधान में भी मिलता है।
युद्ध में लक्ष्य प्राप्ति प्रमुख होती है। परिस्थितियों और समय के अनुसार निर्णय लेना नायक की बुद्धिमत्ता और साहस पर निर्भर होता है। महात्मा गांधी ने प्रथम आंदोलन इस बात पर शुरू किया था कि भारत को स्वतंत्रता मिलेगी। परन्तु उनका आंदोलन सफल नहीं हुआ और उन्हें लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हुई। इस असफलता से महात्मा गांधी की महानता कम नहीं होती। इसी प्रकार चौरी-चोरा की घटना के कारण अपने निर्णय से पीछे हटना पड़ा था। इसी प्रकार कालापानी में यातना सह रहे क्रांतिकारियों द्वारा दया याचिका से क्रांतिकारियों की महानता] त्याग और बलिदान को कम नहीं किया जा सकता है। देशभक्ति] राष्ट्रप्रेम में अपनी जान देना और अपने लक्ष्य प्राप्ति के लिए जिंदा रहना, दोनों ही महत्वपूर्ण है] यह बात केवल वहीं समझ सकता है जिसके लिए राष्ट्र सर्वोपरि है।

चित्तौड़ का जौहर, हल्दीघाटी का युद्ध] भगत सिंह की फांसी] वीर सावरकर को काला पानी] श्री अरविन्द का पांडिचेरी जाना, चौरी-चोरा के कारण आंदोलन को रोक देना] डॉ0 अम्बेड़कर-गांधीजी के बीच पूना पैक्ट] ब्रिटिश सरकार में अन्दर रह कर स्वतंत्रता संग्राम को आगे बढ़ाना] द्वितीय विश्व युद्ध में भारतीयों का सेना-फौज में भर्ती होना] भारत विभाजन का विरोध आदि निर्णयों को समझने के लिए स्वधर्म और स्वराज का आधार जरूरी है।
समय-समय पर पाठ्यक्रमों में बदलाव की चर्चा होती रहती है। जिसमें विचारधारा के अनुसार देशभक्तों के विषय में टीका-टिप्पणी की जाती है] जो कि राजनीति से प्रेरित होती है। इस तरह का चिंतन राष्ट्र निर्माण और भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं है। अतः यह आवश्यक है कि जिस प्रकार संविधान में बेसिक स्ट्रक्चर  ऑफ कांस्टिट्यूशन है इसी तर्ज पर बेसिक स्ट्रक्चर ऑफ इंडियन हिस्ट्री पर सभी राजनैतिक दल एक मत हो] जिस पर सरकार बदलने से विषय सामग्री बदले।  

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