विद्यालय पाठ्यक्रम में सांविधानिक नैतिकता और श्री अरविन्द का आध्यात्मिक राष्ट्रवाद

विद्यालय पाठ्यक्रम में  सांविधानिक नैतिकता और श्री अरविन्द का आध्यात्मिक राष्ट्रवाद


भारत देश में दुर्भाग्यवश बदलाव और नवीनता के नाम पर पाठ्यक्रम का राजनीतिकरण किया जाता रहा है, जिससे प्राचीन भारत और मध्यकालीन भारत के इतिहास में भारतीय उत्कृष्टता, प्रगतिशिलता और पुरूषार्थ के भाव के विपरीत हीनता आत्मग्लानी के भाव को पढ़ाया जा रहा है। यह सर्वविदित है कि संविधान के आधारित लक्षण बदल नहीं सकते। इसी तर्ज पर भारतीय इतिहास के आधारित संरचना भी नहीं बदली जा सकती। इसका आधार और समाधान भारत के मूल हस्तलिपिबद्ध संविधान में मिलता है। भारत के संविधान में फोटोलिथोग्राफी रचना में भारत के इतिहास की झांकी स्पष्ट दिखती है। जो मूल संविधान में वैदिक काल के गुरूकुल का दृश्य रामायण से श्रीराम व माता सीता और लक्ष्मण के वनवास से घर वापस आने का दृश्य, श्री कृष्ण द्वारा अर्जून को कुरूक्षेत्र में दिए गए गीता के उपदेश, के दृश्यों को दर्शाया गया। इसी प्रकार गौतम बुद्ध व महावीर के जीवन, सम्राट अशोक व विक्रमादित्य के सभागार के दृश्य मूल संविधान में मिलते है। इसके अलावा अकबर, शिवाजी, गुरूगोबिन्द सिंह, टीपू सुल्तान और रानी लक्ष्मीबाई के चित्र भी मूल संविधान में है। स्वतंत्रता संग्राम के दृश्य को महात्मा गांधी की दाण्डी मार्च से दर्शाया है। इसी प्रकार नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का चित्र मूल संविधान में राष्ट्रवादी क्रांतिकारियों का प्रतिनिधित्व करता है। नेताजी का ‘भारत माता’ को विदेशी शासन से आजादी के लिए तिरंगे को सलामी देने वाला चित्र संविधान में मिलता है। फोटोलिथोग्राफी रचना को एक आदर्श के रूप में स्वीकारा जा सकता है व मार्गदर्शन लिया जा सकता है, जिस पर कोई असहमति नहीं हो सकती। 

आवश्यकता इस बात की है कि युवा को भारतीय दण्ड संहिता में वर्णित राजद्रोह के परिणामों से डराकर नहीं वरन बाबा साहेब अम्बेडकर के साविधानिक नैतिकता का पाठ पढ़ाने की अत्यंत आवश्यकता है, जिससे की भारत की प्रभुता, एकता और अखण्ड़ता की रक्षा की जा सकें और उसे अक्षुण्ण रखें। शिक्षा में स्वायत्तता के विषय में यह अपरिहार्य हो जाता है कि कम से कम संविधान सभा द्वारा हस्ताक्षरित, सर्वसम्मति से चुने गऐ चित्रों के बारे में पाठ्यक्रम में पढ़ाया जावें। 

जब राष्ट्रवाद की बात होती है तो अक्सर एक जाति, एक भाषा, एक धर्म की एकरूपता के लक्षण को अनिवार्य बताया जाता है, जो कि एक पश्चिमी सोच है। परन्तु इस प्रकार कि राष्ट्रवाद की सोच को श्री अरविन्द खण्डन करते है, वन्देमातरम् पत्रिका में लिखते है कि जाति, भाषा व धर्म में विभिन्नता होने के बावजूद लोगों में राष्ट्रीय एकता का भाव रहता है। 

भारत में उस एकता के सूत्र का आधार है भारतीय संस्कृति। वर्ष 1909 में उत्तरपाड़ा के भाषण में श्री अरविन्द ने स्पष्ट रूप से कहा था कि भारत की राष्ट्रीयता है उसकी आध्यमिकता। इस प्रकार श्री अरविन्द के आध्यत्मिक राष्ट्रवाद की संकल्पना ही भारतीय राष्ट्रवाद है। इसी क्रम में श्री अरविन्द बताते है कि हर राष्ट्र की एक सामूहिक आत्मा होती है, जो कि दिव्य विधान के अनुसार नियत कार्यों को सम्पादित करने के लिए आदेशित है। श्री अरविन्द चेतावनी देते है कि जिस प्रकार व्यक्ति के अहंकार में दोष होते है, जबकि व्यक्ति की आत्मा दिव्य होती है, उसी प्रकार राष्ट्रीय अहंकार के अपने र्दुगुण है, जिससे सावधान रहने की आवश्यकता है। व्यक्ति की विशिष्टता को अनुशासन के लिए नहीं दबाया जाना चाहिए बल्कि सामाजिक स्वर संगति में बहुत ही सजनता से उसे गोथने की जरूरत है। इसी प्रकार राष्ट्रीय सामूहिक विशिष्टता को संजोना एवं पल्लवित करना होगा जिससे वह मानव जाति के विरोधी न हो। प्रत्येक मानव समूह की पृथक सांस्कृतिक विशेषताऐं होती है जो कि मूल्यवान होती है। वे तब तक उभर नहीं सकती जब तक की उन्हें अलग से विकसित होने का मौका नहीं मिले।
अनेकता में एकता के सूत्र में संसार का अस्तित्व है। अतः मात्र एकरूपता उतनी ही असंगत है जितना कि बहीमुखीता से एकता के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता। अतएव राष्ट्रवाद मानवता के लिए अत्यंत आवश्यक है। श्री अरविन्द लिखते है कि राष्ट्रवाद, अन्तर्राष्ट्रवाद एक-दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि पूरक है। क्योंकि अन्तर्राष्ट्रवाद में हर राष्ट्र अपनी अद्वितीयता से दूसरे को समृद्ध कर सकता है। परन्तु इसके लिए यह नितान्त आवश्यक है कि सर्वप्रथम हर राष्ट्र वह प्रवीणता प्राप्त करें जिसके लिए उसकी सामूहिक चेतना उन्नीलित होकर विश्व में अवतरित हो। विभिन्न राष्ट्रों की विशिष्ट चेतना के बारे में श्री अरविन्द लिखते है कि भारत को आध्यात्मिकता, अमरिका को वाणिज्य ऊर्जा, इंग्लैण्ड को व्यवहारिक बौधिकता, फ्रांस को स्पष्ट तार्किकता, जर्मनी को मिमांसात्मक प्रवीणता, रूस को भावनात्मक प्रचण्डता आदि को मानव जाति की कल्याण, समृद्धि और प्रगति के लिए विकसित करने की आवश्यकता है। सार यह है कि धरती माता विभिन्न राष्ट्रों के रूप में स्वयं को उत्तरोतर अभिव्यक्त कर रही है। संयुक्त राष्ट्र के गठन को विश्व सरकार के रूप में उसी दिशा में बढ़ता कदम देखा जाना चाहिए। 

विद्यालय, महाविद्यालयों व विश्वविद्यालयों को यह चुनौती स्वीकार करनी होगी कि भारत के संविधान की पहली पंक्ति ‘‘हम भारत के लोग’’ में अटूट विश्वास व श्रद्धा आज के युवाओं के चरित्र की नींव में रखनी होगी। जिसके लिए भारतीय राष्ट्रवाद, भारतीय संस्कृति व भारतीय इतिहास महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते है। क्योंकि भारतीय का अर्थ ही यह है कि एकीकरण, समावेश और संश्लेषण। 
हम भारतीयों को यह याद रखने की जरूरत है कि भारत के संविधान में संशोधन के माध्यम से उद्देशिका में 42वें संशोधन के द्वारा 1976 में एकता और अखण्डता को जोड़ा, 16वें संशोधन द्वारा 1963 में भारत के प्रभुता और अखण्डता को अनुच्छेद 19(1)(क) वाक्-स्वातन्त्र्य और अभिव्यक्ति स्वातन्त्र्य के अन्तर्गत निर्बधन अधिरोपति करने के लिए जोड़ा व मूल कर्त्तव्यों में भी 51क(ग) में भारत की प्रभुता, एकता और अखण्डता व अक्षुण्णता सम्मिलित है, जिन्हें संविधान में 42वें संशोधन द्वारा भाग 4क के द्वारा जोड़ा गया।
भारत के संविधान में किये गए 16 वे और 42 वे संशोधन से आज का युवा अनभिज्ञ है।  यही  कारण है की 
कुछ समय से   शिक्षण संस्थाओं में  शैक्षिक चर्चाओं में  राष्ट्र विरोधी विकृति  देखी जा  रही है।  देश की राजधानी दिल्ली में स्थित जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय , जाधवपुर विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, जोधपुर विश्वविद्यालय और रामजस महाविद्यालय की घटनाओ में  यह विकृति स्पष्ट रूप से दिखती  है। राष्ट्र विरोधी नारे लगाने वाले सभी छात्र व छात्राऐं वर्ष 2005 के बाद के राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् (एनसीईआरटी) के पाठ्यक्रम को पढ़ने वाले विद्यार्थी रहे है। एनसीईआरटी व जेएनयू के घटनाओं में सीधा व गहरा सम्बन्ध है। भारतीय संस्कृति के प्रतीक स्वामी विवेकानन्द व श्री अरविन्द के साथ-साथ तीन दर्जन क्रांतिकारियों को वर्ष 2005 से एनसीईआरटी पाठ्यक्रम की कक्षा छह से बारहवीं से सुनियोजित ढंग से हटा दिया है। अरविंदो घोष, चन्द्र शेखर आजाद, सुखदेव, राजगुरू, वीर सावरकर, उधमसिंह, खुदीराम बोस, रामप्रसाद बिस्मिल, अश्फाक उल्ला खां, बटूकेश्वर दत्त, जतिन्द्रनाथ दास, राम बिहारी बोस, मदन लाल धींगड़ा, सूर्यसेन, सरदार करतार सिंह, सचेन्द्र नाथ सान्याल, विनय कृष्ण बसु, डॉ. सिफुद्दीन, दिनेश गुप्ता, कल्पना दत्त, एम.एन. रॉय, मैडम भीकाजी कामा, श्यामजी कृष्ण वर्मा, सोहन सिंह, अब्दुल्ला सिंधी, प्रफुल्ल चाकी, प्रतिलता वाडेकर, राजा महेन्द्र प्रताप, रानी गाइड ऐन्यू आदि तीन दर्जन क्रांतिकारियों को वर्ष 2005 के पहले के पाठ्यक्रम में युक्तियुक्त बताया व संदर्भ सम्बन्धित घटनाओं का वर्णन भी दिया गया था। जबकि उपरोक्त तीन दर्जन क्रांतिकारियों का वर्तमान एन.सी.ई.आर.टी. पाठ्यक्रम में कोई उल्लेख नहीं है। इनके स्थान पर 37 पृष्ठों में फैशन व क्रिकेट को पढ़ाया जा रहा है। गौरतलब है कि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के बारे में दी गई जानकारी कम कर दी गई है। इस मुद्दे को जब केन्द्रीय सूचना आयोग, नई दिल्ली में सूचना के अधिकार के तहत उठाया गया तब अपील में सूचना के अधिकार के तहत इन पंक्तियों में लेखक के द्वारा लगाए सभी आरोपों को एनसीईआरटी ने स्वीकारा। सार यह है कि तत्कालीक केन्द्र में रही सरकार द्वारा भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को कमजोर किया गया। इसका नतीजा यह हुआ कि बलिदान, कुर्बानी व त्याग के भाव देश के लिए जान न्यौछावर कर देना व राष्ट्रीयता के भाव वर्ष 2005 में बदले गए पाठ्यक्रम से सोची-समझी साजिश के तहत हटा दिए गए। कक्षा 10 के अध्याय छह में राष्ट्रवाद को मानवतावाद के विरूद्ध खड़ा कर दिया है। रविन्द्रनाथ टैगोर के चिन्तन से राष्ट्रवाद व मानवतावाद के बीच द्वन्द्ध दर्शाने का प्रयास किया है। जबकि अरविन्दो घोष के राजनैतिक चिन्तन ने राष्ट्रवाद, अन्तर्राष्ट्रीयता एक-दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि पूरक है। यहीं द्वन्द्ध रामजस महाविद्यालय, नई दिल्ली की छात्रा गुरमेहर कौर का है। उसका कसूर यही है कि देश में शिक्षा ही राष्ट्रवाद से सम्बन्धित द्वन्द्ध पैदा करने की दी जा रही है। गुरमेहर, जो कि एक शहीद की पुत्री है, का व्यवहार तो रोग सूचक है। बीमारी की पहचान के लिए विद्यालयों के पाठ्यक्रम को ठीक करना होगा।सही समय पर सही फैसला नहीं लेने पर देश को गम्भीर परिणाम भुगतने पड़ सकते है।

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