दीपावली: तीन युग, तीन कथाएँ और एक जीवंत सभ्यता
दीपावली: तीन युग, तीन कथाएँ और एक जीवंत सभ्यता
श्री अरविंद का चिंतन और भारतीय सभ्यता की निरंतरता
दीपावली
क्यों मनाएँ? आज की Gen Z के सामने यह प्रश्न स्वाभाविक है। क्या दीपावली केवल एक
धार्मिक पर्व है, पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा है, अथवा
अपनी सभ्यता के इतिहास, दर्शन और सांस्कृतिक चेतना को समझने का अवसर? आधुनिकता
और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के युग में युवा परंपराओं के पीछे का तर्क जानना चाहते
हैं। इस प्रश्न का उत्तर दीपावली से जुड़ी कथाओं और भारतीय सभ्यता की प्रकृति को
समझने में निहित है।
भारतीय
सभ्यता की ऐतिहासिक यात्रा को समझने के लिए कभी-कभी पैलिम्प्सेस्ट का रूपक
प्रस्तुत किया जाता है। पैलिम्प्सेस्ट ऐसी प्राचीन पांडुलिपि होती है, जिस
पर पुरानी लिखावट मिटाकर नई लिखावट अंकित की जाती थी, फिर
भी पहले के लेखन के चिह्न शेष रहते थे। इस रूपक के माध्यम से भारतीय इतिहास को
विभिन्न कालखंडों के विचारों, सांस्कृतिक प्रभावों, प्रवासों
और ऐतिहासिक घटनाओं की परतों के रूप में समझने का प्रयास किया जाता है।हालाँकि, इस
दृष्टिकोण की एक ऐसी व्याख्या भी सामने आती है,
जिसमें भारत को विभिन्न प्रवासों और
आक्रमणों से बनी सांस्कृतिक परतों का समूह मान लिया जाता है। इस विचारधारा के
अनुसार, भारत की अपनी कोई स्वतंत्र,
मौलिक सांस्कृतिक पहचान नहीं है; उसकी
संस्कृति विभिन्न बाहरी प्रभावों का परिणाम मात्र है। ऐसी धारणा भारत की सभ्यता को
एक धर्मशाला की तरह प्रस्तुत करती है,
जहाँ विभिन्न समुदाय आते रहे और अपनी
छाप छोड़ते रहे।लेकिन क्या भारतीय संस्कृति को केवल प्रवासों और आक्रमणों के
परिणाम के रूप में समझा जा सकता है?
क्या उसकी अपनी कोई मौलिक चेतना, विचार-परंपरा
और सृजनशील शक्ति नहीं रही है?
श्री
अरविंद का सांस्कृतिक चिंतन इन प्रश्नों पर गहराई से विचार करने की प्रेरणा देता
है। अपनी पुस्तक भारतीय संस्कृति के आधार में
वे भारतीय मानस की आध्यात्मिकता, जीवनशक्ति और बौद्धिकता को उसकी विशिष्ट
पहचान के रूप में रेखांकित करते हैं।वे लिखते हैं
कि आध्यात्मिकता निस्संदेह भारतीय मानस
की मूल कुंजी है; अनंत का बोध इसकी सहज प्रकृति है l किन्तु आध्यात्मिकता स्वयं
पृथ्वी पर शून्य में विकसित नहीं होती,
ठीक वैसे ही जैसे हमारे पर्वतों की
चोटियाँ किसी स्वप्निल जादू के प्रभाव से बादलों में से बिना किसी आधार के नहीं उठ
खड़ी होतीं। जब हम भारत के अतीत पर दृष्टि डालते हैं, तो
इसके बाद जो बात हमें सबसे अधिक प्रभावित करती है,
वह है उसकी अद्भुत जीवनशक्ति, जीवन
के प्रति उसकी अक्षय ऊर्जा और आनंद की अनुभूति तथा उसकी अकल्पनीय रूप से विपुल
सृजनशीलता। प्राचीन भारतीय आत्मा की तीसरी शक्ति थी उसकी प्रबल बौद्धिकता—जो एक
साथ तपस्वी और समृद्ध, सुदृढ़ और सूक्ष्म,
शक्तिशाली और कोमल, सिद्धांतों
में व्यापक तथा विवरणों के प्रति जिज्ञासु थी।
श्री
अरविंद का यह विचार स्पष्ट करता है कि भारतीय आध्यात्मिकता किसी आधारहीन अवधारणा
का नाम नहीं है। उसका विकास एक समृद्ध जीवन-दृष्टि,
व्यापक बौद्धिक परंपरा और असाधारण
सृजनशीलता के साथ हुआ है।
इसी
संदर्भ में गोविंद चंद्र पांडे का विचार भी उल्लेखनीय है। वे लिखते कि
भारतीय संस्कृति न तो सदियों के दौरान घटित हुई मात्र आकस्मिक घटनाओं का परिणाम है
और न ही प्रवासों एवं आक्रमणों की परत-दर-परत लिखी गई कोई पैलिम्प्सेस्ट मात्र।
अपने सारतत्त्व में यह उन आधारभूत विचारों का विकास है, जिन्होंने
एक सृजनात्मक आधारभूमि का निर्माण किया है। इसके बदलते हुए ऐतिहासिक स्वरूपों के
पीछे सृजनशीलता का एक गहन और निरंतर प्रवाह विद्यमान है, जिसका
चरित्र आध्यात्मिक है।
इस
दृष्टि से भारतीय सभ्यता की निरंतरता का अर्थ अतीत को ज्यों का त्यों दोहराना नहीं, बल्कि
उसके मूलभूत आदर्शों को प्रत्येक युग की आवश्यकताओं के अनुरूप नए रूपों में
अभिव्यक्त करना है। यही विचार
युगधर्म की
अवधारणा से भी जुड़ता है। प्रत्येक युग की चुनौतियाँ अलग होती हैं, इसलिए
सत्य, धर्म, न्याय और लोककल्याण जैसे मूल्यों की अभिव्यक्ति भी समयानुसार
बदल सकती है। भारतीय पुनर्जागरण का वास्तविक अर्थ केवल अतीत का गौरवगान नहीं, बल्कि
उसकी चिरंतन चेतना को वर्तमान जीवन में रचनात्मक रूप से प्रकट करना है।
दीपावली
से जुड़ी विभिन्न परंपराएँ भारतीय सांस्कृतिक स्मृति की विविधता और गहराई को समझने
का अवसर देती हैं। सतयुग,
त्रेतायुग और द्वापरयुग से संबंधित तीन
प्रमुख कथाएँ समृद्धि,
धर्म और स्वतंत्रता के अलग-अलग आदर्शों
को सामने लाती हैं।1.
सतयुग: समुद्र मंथन और माँ लक्ष्मी का
प्राकट्य-हिंदू धर्मग्रंथों में वर्णित समुद्र मंथन से माँ लक्ष्मी का प्राकट्य
समृद्धि,
ऐश्वर्य और कल्याण का प्रतीक है।
दीपावली पर लक्ष्मी-पूजन की परंपरा आर्थिक संपन्नता के साथ शुभता और मंगल की कामना
भी व्यक्त करती है।2.
त्रेतायुग: श्रीराम की अयोध्या वापसी-रामायण
की परंपरा के अनुसार,
चौदह वर्ष के वनवास के पश्चात श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण के अयोध्या लौटने
पर लोगों ने दीप जलाकर प्रसन्नता व्यक्त की। यह प्रसंग धर्म की पुनर्स्थापना, आशा और अन्याय पर न्याय की विजय का
प्रतीक बन गया।3.
द्वापरयुग: श्रीकृष्ण की नरकासुर पर
विजय-नरक चतुर्दशी की परंपरा श्रीकृष्ण की नरकासुर पर विजय से जुड़ी है। इस आख्यान
का केंद्रीय भाव अत्याचार का अंत और बंदियों की मुक्ति है। यह स्वतंत्रता, मानवीय गरिमा तथा अन्याय के प्रतिरोध का
संदेश देता है।
इन
कथाओं के युग-संबंधी विवरण धार्मिक परंपराओं का हिस्सा हैं। इनका महत्त्व उन
मूल्यों में भी है, जिन्हें भारतीय समाज ने पीढ़ियों तक इनके माध्यम से संप्रेषित
किया है। इन तीनों कथाओं में समृद्धि,
धर्म और स्वतंत्रता के अलग-अलग आदर्श
दिखाई देते हैं।परंपरा का जीवंत होना तभी संभव है,
जब वह वर्तमान से संवाद करे। अतीत को
समझना आधुनिकता से विमुख होना नहीं है;
बल्कि वह वर्तमान की समस्याओं का सामना
करने के लिए नैतिक और बौद्धिक आधार प्रदान कर सकता है। दीपावली का उत्सव इसलिए भी
महत्त्वपूर्ण है कि उसके संदेश आज के जीवन में नए अर्थ ग्रहण कर सकते हैं। समृद्धि
के साथ विवेक, शक्ति के साथ मर्यादा और स्वतंत्रता के साथ उत्तरदायित्व—ये
मूल्य किसी एक युग तक सीमित नहीं हैं।युवा पीढ़ी के सामने चुनौती परंपरा और
आधुनिकता में से किसी एक को चुनने की नहीं,
बल्कि दोनों के बीच सार्थक संवाद
स्थापित करने की है। किसी परंपरा को समझे बिना उसका पालन करना उसे औपचारिकता बना
सकता है; वहीं, उसके ऐतिहासिक और दार्शनिक संदर्भों को जाने बिना उसे
अप्रासंगिक मान लेना भी उचित नहीं।दीपावली युवाओं को प्रश्न पूछने, अपनी
सांस्कृतिक विरासत के स्रोतों को जानने और उसके मूल्यों को समकालीन जीवन से जोड़ने
का अवसर देती है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी समझ और विवेक के आधार पर इन परंपराओं से
संवाद कर सकता है।भारत का वास्तविक पुनर्जागरण अतीत की नकल करने में नहीं, बल्कि
उसकी चिरंतन चेतना को प्रत्येक युग में नए विचारों,
नए संकल्पों और नई सृजनशीलता के साथ
अभिव्यक्त करने में निहित है।दीपक प्राचीन हो सकता है, लेकिन
उसका प्रकाश हर युग को नई दिशा दे सकता है। यही दीपावली का संदेश है—अपनी जड़ों को
जानिए, अपनी सभ्यता को समझिए और उसके भविष्य के सृजनकर्ता बनिए।
शुभ
दीपावली!
सूर्य प्रताप सिंह राजावत उपाध्यक्ष, श्री अरविंद सोसाइटी, राजस्थान राज्य समिति
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