अर्बन नक्सल विमर्श, सत्ता परिवर्तन और भारतीय संविधान
अर्बन नक्सल विमर्श, सत्ता
परिवर्तन और भारतीय संविधान
भारतीय
संविधान की उद्देशिका के प्रथम शब्द हैं—“हम,
भारत के लोग।” ये शब्द भारत की
संवैधानिक संप्रभुता के मूल आधार को अभिव्यक्त करते हैं। 26 नवंबर
1949 को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित तथा 26 जनवरी
1950 को लागू हुआ हमारा संविधान केवल शासन चलाने का दस्तावेज नहीं, बल्कि
राष्ट्र की संप्रभुता, लोकतांत्रिक संस्थाओं,
नागरिक स्वतंत्रताओं और विधि के शासन का
आधार है।लेकिन एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है: क्या “हम, भारत के लोग” का अर्थ यह है कि कोई भी
व्यक्ति,
संगठन अथवा राजनीतिक समूह अपनी
इच्छानुसार सत्ता परिवर्तन के लिए संवैधानिक संस्थाओं को दरकिनार कर सकता है? क्या लोकप्रिय समर्थन का दावा करके
निर्वाचित सरकार को हटाने के लिए किसी भी प्रकार के साधनों को उचित ठहराया जा सकता
है?इन प्रश्नों पर गंभीर संवैधानिक विमर्श
आवश्यक है।
सत्ता
परिवर्तन: लोकतांत्रिक अधिकार या संवैधानिक व्यवस्था को चुनौती? -अक्टूबर 2026 में निर्वाचन आयोग और मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से संबंधित विवादों के बीच सत्ता
परिवर्तन की माँग सार्वजनिक विमर्श का विषय बनी। 15 अक्टूबर 2026 को
दिल्ली में आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन में वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा
कि वे सत्ता परिवर्तन चाहते हैं और इसे नागरिकों का लोकतांत्रिक अधिकार बताया। इसी
संवाददाता सम्मेलन में ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन की
अध्यक्ष नेहा बोरा तथा कॉकरोच जनता
पार्टी के
संस्थापक अभिजीत दिपके भी उपस्थित थे।नेहा बोरा ने बांग्लादेश के Gen Z आंदोलन का उल्लेख करते हुए उसे भारत के
युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत बताया। बांग्लादेश में 2024 के छात्र आंदोलन के परिणामस्वरूप शेख हसीना की सरकार सत्ता से
बाहर हुई थी। यहाँ मूल संवैधानिक प्रश्न उठता है: सत्ता परिवर्तन अपने आप में
असंवैधानिक नहीं है। लोकतंत्र में सरकारें बदलती हैं और नागरिकों को सरकार की
आलोचना करने,
शांतिपूर्ण आंदोलन करने तथा चुनावों के
माध्यम से सरकार बदलने का अधिकार है। विपक्ष का दायित्व भी सरकार को जवाबदेह बनाना
है।लेकिन सत्ता परिवर्तन की लोकतांत्रिक माँग और संवैधानिक प्रक्रिया को दरकिनार
करके सत्ता प्राप्त करने का प्रयास दो अलग-अलग विषय हैं। किसी आंदोलन की वैधता का
आकलन उसके घोषित उद्देश्यों के साथ-साथ उसके साधनों, आचरण और संवैधानिक संस्थाओं के प्रति दृष्टिकोण के आधार पर
होना चाहिए।
‘अर्बन नक्सल’ मानसिकता और वैचारिक
प्रश्न-‘अर्बन नक्सल’ अथवा ‘अर्बन नक्सल मानसिकता’ जैसे शब्द भारतीय
राजनीतिक विमर्श में प्रायः उन व्यक्तियों या समूहों के संदर्भ में इस्तेमाल किए
जाते हैं जिन पर माओवादी विचारधारा अथवा नक्सली आंदोलन के प्रति सहानुभूति रखने का
आरोप लगाया जाता है जो सत्ता परिवर्तन में
हिंसा को वैध मानते हैं lअक्टूबर 2026
में सत्ता परिवर्तन संबंधी बयानों के
बाद भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने आरोप लगाया कि संबंधित विरोध प्रदर्शनों के
पीछे केवल चुनाव सुधारों का प्रश्न नहीं, बल्कि सरकार को अस्थिर करने और सत्ता
परिवर्तन का व्यापक उद्देश्य भी हो सकता है। भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन ने इस
राजनीतिक अभियान को कथित ‘अर्बन नक्सल’ एजेंडे से जोड़ते हुए आलोचना की। फ्रांस
में हालिया विरोध-प्रदर्शनों,
बांग्लादेश में 2024 के
जनांदोलन और नेपाल में 2025
के Gen Z आंदोलन ने दिखाया है कि जन-असंतोष किस
प्रकार हिंसा और राजनीतिक उथल-पुथल में बदल सकता है। बांग्लादेश में शेख हसीना की
सरकार सत्ता से बाहर हुई,
जबकि नेपाल में भ सोशल मीडिया प्रतिबंध
के विरुद्ध आंदोलन के बाद हिंसक सत्ता परिवर्तन हुआ ।भारत में निर्वाचन प्रक्रिया
से जुड़े विरोध-प्रदर्शनों के बीच वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण द्वारा सत्ता
परिवर्तन की माँग और AISA
की अध्यक्ष नेहा बोरा द्वारा बांग्लादेश
आंदोलन का उल्लेख राजनीतिक बहस का विषय बना है। कांग्रेस नेता पवन
खेड़ा ने भी सत्ता परिवर्तन की बात कही है lमूल संवैधानिक सिद्धांत स्पष्ट
है कि शांतिपूर्ण असहमति और चुनावों के माध्यम से सत्ता परिवर्तन लोकतांत्रिक अधिकार
हैं, लेकिन हिंसा और सशस्त्र विद्रोह संवैधानिक प्रक्रियाओं का विकल्प
नहीं हो सकते। भारत की संप्रभुता की रक्षा संविधान, लोकतांत्रिक संस्थाओं और विधि के शासन के
सम्मान में निहित है।फिर भी यह विमर्श एक व्यापक संवैधानिक प्रश्न अवश्य उठाता है:
क्या किसी राजनीतिक आंदोलन के नाम पर ऐसी विचारधारा अथवा रणनीति को वैधता दी जा
सकती है जो लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करके राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने का
समर्थन करती हो?यदि किसी व्यक्ति या संगठन द्वारा सशस्त्र विद्रोह, हिंसक
उथल-पुथल अथवा बलपूर्वक सरकार गिराने की वकालत की जाती है, तो
उसके आचरण का परीक्षण संविधान और लागू कानूनों के अनुसार होना चाहिए।
सशस्त्र
विद्रोह का संवैधानिक संप्रभुता में कोई स्थान नहीं-भारतीय लोकतंत्र का आधार यह है
कि राजनीतिक सत्ता संविधान द्वारा निर्धारित प्रक्रियाओं के माध्यम से प्राप्त की
जाती है। संसद और राज्य विधानमंडलों का गठन चुनावों से होता है। सरकारें संवैधानिक
नियमों के अनुसार कार्य करती हैं और न्यायपालिका कानूनों तथा सरकारी कार्यों की
न्यायिक समीक्षा कर सकती है।सशस्त्र विद्रोह और हिंसक साधनों से सत्ता प्राप्त
करने का प्रयास इस संवैधानिक व्यवस्था के मूल सिद्धांतों से असंगत है। संवैधानिक
लोकतंत्र में किसी भी राजनीतिक समूह को यह अधिकार नहीं है कि वह अपनी वैचारिक
श्रेष्ठता या कथित जनसमर्थन के आधार पर लोकतांत्रिक प्रक्रिया का स्थान बल प्रयोग
को दे दे।अतः यह सिद्धांत स्पष्ट होना चाहिए: संवैधानिक संप्रभुता के अंतर्गत सशस्त्र
विद्रोह द्वारा सत्ता प्राप्त करने का कोई वैध स्थान नहीं है।
‘हम, भारत के लोग’ का वास्तविक अर्थ-संविधान की उद्देशिका जनता को संवैधानिक
व्यवस्था का मूल स्रोत स्वीकार करती है। इसका अर्थ यह नहीं कि प्रत्येक नागरिक या
संगठन को असीमित संप्रभु शक्ति प्राप्त है। जनता की संप्रभुता संविधान द्वारा
स्थापित संस्थाओं,
अधिकारों, कर्तव्यों और प्रक्रियाओं के माध्यम से अभिव्यक्त होती है।डॉ.
बी. आर. आंबेडकर ने 4
नवंबर 1948 को संविधान सभा में संवैधानिक नैतिकता के महत्त्व पर बल दिया
था। संवैधानिक नैतिकता का अर्थ केवल संविधान के शब्दों को स्वीकार करना नहीं, बल्कि उसकी संस्थाओं, प्रक्रियाओं और लोकतांत्रिक मर्यादाओं
का सम्मान करना भी है।इसलिए सरकार की आलोचना करना, निर्वाचन आयोग से जवाबदेही माँगना, न्यायिक समीक्षा की माँग करना और
शांतिपूर्ण आंदोलन करना लोकतांत्रिक अधिकारों का हिस्सा हो सकता है। लेकिन इन
अधिकारों का हवाला देकर हिंसा, सशस्त्र
विद्रोह अथवा गैरकानूनी तरीकों से सत्ता प्राप्त करने को उचित नहीं ठहराया जा
सकता।
लोकतांत्रिक
असहमति और संवैधानिक मर्यादा-भारत
में राजनीतिक परिवर्तन का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव हैं।
यदि किसी राजनीतिक दल या नागरिक समूह को सरकार की नीतियों, निर्वाचन प्रक्रिया या संवैधानिक
संस्थाओं के कामकाज पर आपत्ति है, तो
उसे शांतिपूर्ण विरोध,
न्यायिक उपचार, सार्वजनिक विमर्श और लोकतांत्रिक
प्रक्रिया का सहारा लेना चाहिए। जब निर्वाचन आयोग से संबंधित कोई विवाद सर्वोच्च न्यायालय के
समक्ष विचाराधीन हो,
तब संवैधानिक नैतिकता यह अपेक्षा करती
है कि सभी राजनीतिक दल न्यायपालिका में विश्वास बनाए रखें और न्यायिक प्रक्रिया के
परिणाम की प्रतीक्षा करें। न्यायालय में लंबित विषयों पर जनमत को प्रभावित करने के
उद्देश्य से चलाए जाने वाले मीडिया ट्रायल तथा अप्रमाणित आरोप संवैधानिक संस्थाओं
की निष्पक्षता पर अनावश्यक प्रश्न खड़े कर सकते हैं। लोकतंत्र में असहमति और
आलोचना का अधिकार महत्त्वपूर्ण है, किंतु उसके साथ संस्थागत मर्यादा और जिम्मेदारी भी आवश्यक है।
न्यायपालिका में आस्था,
तथ्यों पर आधारित विमर्श और न्यायिक
प्रक्रिया के प्रति संयम ही संवैधानिक लोकतंत्र की वास्तविक कसौटी हैं।भारत की
संवैधानिक संप्रभुता किसी एक राजनीतिक दल,
सरकार,
विपक्ष,
संगठन या विचारधारा की संपत्ति नहीं है।
यह उस संवैधानिक व्यवस्था में निहित है जिसे भारत के लोगों ने स्वीकार किया
है।सत्ता परिवर्तन लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है,
लेकिन उसका औचित्य और तरीका
महत्त्वपूर्ण है। शांतिपूर्ण असहमति लोकतंत्र को मजबूत करती है; हिंसा
और सशस्त्र विद्रोह उसकी संस्थागत नींव को चुनौती देते हैं।भारत में सरकारें बदल
सकती हैं, नीतियाँ बदल सकती हैं और राजनीतिक विचारधाराएँ बदल सकती हैं; लेकिन
सत्ता प्राप्त करने की प्रक्रिया संविधान के अधीन ही रहनी चाहिए। संवैधानिक
संप्रभुता की रक्षा का अर्थ है—लोकतांत्रिक असहमति का सम्मान करना और साथ ही
सशस्त्र विद्रोह द्वारा सत्ता प्राप्त करने की अवधारणा को अस्वीकार करना।
सूर्य प्रताप सिंह राजावत
अधिवक्ता,
राजस्थान उच्च न्यायालय, जयपुर
भारतीय
संविधान की उद्देशिका के प्रथम शब्द हैं—“हम,
भारत के लोग।” ये शब्द भारत की
संवैधानिक संप्रभुता के मूल आधार को अभिव्यक्त करते हैं। 26 नवंबर
1949 को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित तथा 26 जनवरी
1950 को लागू हुआ हमारा संविधान केवल शासन चलाने का दस्तावेज नहीं, बल्कि
राष्ट्र की संप्रभुता, लोकतांत्रिक संस्थाओं,
नागरिक स्वतंत्रताओं और विधि के शासन का
आधार है।लेकिन एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है: क्या “हम, भारत के लोग” का अर्थ यह है कि कोई भी
व्यक्ति,
संगठन अथवा राजनीतिक समूह अपनी
इच्छानुसार सत्ता परिवर्तन के लिए संवैधानिक संस्थाओं को दरकिनार कर सकता है? क्या लोकप्रिय समर्थन का दावा करके
निर्वाचित सरकार को हटाने के लिए किसी भी प्रकार के साधनों को उचित ठहराया जा सकता
है?इन प्रश्नों पर गंभीर संवैधानिक विमर्श
आवश्यक है।
सत्ता
परिवर्तन: लोकतांत्रिक अधिकार या संवैधानिक व्यवस्था को चुनौती? -अक्टूबर 2026 में निर्वाचन आयोग और मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से संबंधित विवादों के बीच सत्ता
परिवर्तन की माँग सार्वजनिक विमर्श का विषय बनी। 15 अक्टूबर 2026 को
दिल्ली में आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन में वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा
कि वे सत्ता परिवर्तन चाहते हैं और इसे नागरिकों का लोकतांत्रिक अधिकार बताया। इसी
संवाददाता सम्मेलन में ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन की
अध्यक्ष नेहा बोरा तथा कॉकरोच जनता
पार्टी के
संस्थापक अभिजीत दिपके भी उपस्थित थे।नेहा बोरा ने बांग्लादेश के Gen Z आंदोलन का उल्लेख करते हुए उसे भारत के
युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत बताया। बांग्लादेश में 2024 के छात्र आंदोलन के परिणामस्वरूप शेख हसीना की सरकार सत्ता से
बाहर हुई थी। यहाँ मूल संवैधानिक प्रश्न उठता है: सत्ता परिवर्तन अपने आप में
असंवैधानिक नहीं है। लोकतंत्र में सरकारें बदलती हैं और नागरिकों को सरकार की
आलोचना करने,
शांतिपूर्ण आंदोलन करने तथा चुनावों के
माध्यम से सरकार बदलने का अधिकार है। विपक्ष का दायित्व भी सरकार को जवाबदेह बनाना
है।लेकिन सत्ता परिवर्तन की लोकतांत्रिक माँग और संवैधानिक प्रक्रिया को दरकिनार
करके सत्ता प्राप्त करने का प्रयास दो अलग-अलग विषय हैं। किसी आंदोलन की वैधता का
आकलन उसके घोषित उद्देश्यों के साथ-साथ उसके साधनों, आचरण और संवैधानिक संस्थाओं के प्रति दृष्टिकोण के आधार पर
होना चाहिए।
‘अर्बन नक्सल’ मानसिकता और वैचारिक
प्रश्न-‘अर्बन नक्सल’ अथवा ‘अर्बन नक्सल मानसिकता’ जैसे शब्द भारतीय
राजनीतिक विमर्श में प्रायः उन व्यक्तियों या समूहों के संदर्भ में इस्तेमाल किए
जाते हैं जिन पर माओवादी विचारधारा अथवा नक्सली आंदोलन के प्रति सहानुभूति रखने का
आरोप लगाया जाता है जो सत्ता परिवर्तन में
हिंसा को वैध मानते हैं lअक्टूबर 2026
में सत्ता परिवर्तन संबंधी बयानों के
बाद भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने आरोप लगाया कि संबंधित विरोध प्रदर्शनों के
पीछे केवल चुनाव सुधारों का प्रश्न नहीं, बल्कि सरकार को अस्थिर करने और सत्ता
परिवर्तन का व्यापक उद्देश्य भी हो सकता है। भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन ने इस
राजनीतिक अभियान को कथित ‘अर्बन नक्सल’ एजेंडे से जोड़ते हुए आलोचना की। फ्रांस
में हालिया विरोध-प्रदर्शनों,
बांग्लादेश में 2024 के
जनांदोलन और नेपाल में 2025
के Gen Z आंदोलन ने दिखाया है कि जन-असंतोष किस
प्रकार हिंसा और राजनीतिक उथल-पुथल में बदल सकता है। बांग्लादेश में शेख हसीना की
सरकार सत्ता से बाहर हुई,
जबकि नेपाल में भ सोशल मीडिया प्रतिबंध
के विरुद्ध आंदोलन के बाद हिंसक सत्ता परिवर्तन हुआ ।भारत में निर्वाचन प्रक्रिया
से जुड़े विरोध-प्रदर्शनों के बीच वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण द्वारा सत्ता
परिवर्तन की माँग और AISA
की अध्यक्ष नेहा बोरा द्वारा बांग्लादेश
आंदोलन का उल्लेख राजनीतिक बहस का विषय बना है। कांग्रेस नेता पवन
खेड़ा ने भी सत्ता परिवर्तन की बात कही है lमूल संवैधानिक सिद्धांत स्पष्ट
है कि शांतिपूर्ण असहमति और चुनावों के माध्यम से सत्ता परिवर्तन लोकतांत्रिक अधिकार
हैं, लेकिन हिंसा और सशस्त्र विद्रोह संवैधानिक प्रक्रियाओं का विकल्प
नहीं हो सकते। भारत की संप्रभुता की रक्षा संविधान, लोकतांत्रिक संस्थाओं और विधि के शासन के
सम्मान में निहित है।फिर भी यह विमर्श एक व्यापक संवैधानिक प्रश्न अवश्य उठाता है:
क्या किसी राजनीतिक आंदोलन के नाम पर ऐसी विचारधारा अथवा रणनीति को वैधता दी जा
सकती है जो लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करके राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने का
समर्थन करती हो?यदि किसी व्यक्ति या संगठन द्वारा सशस्त्र विद्रोह, हिंसक
उथल-पुथल अथवा बलपूर्वक सरकार गिराने की वकालत की जाती है, तो
उसके आचरण का परीक्षण संविधान और लागू कानूनों के अनुसार होना चाहिए।
सशस्त्र
विद्रोह का संवैधानिक संप्रभुता में कोई स्थान नहीं-भारतीय लोकतंत्र का आधार यह है
कि राजनीतिक सत्ता संविधान द्वारा निर्धारित प्रक्रियाओं के माध्यम से प्राप्त की
जाती है। संसद और राज्य विधानमंडलों का गठन चुनावों से होता है। सरकारें संवैधानिक
नियमों के अनुसार कार्य करती हैं और न्यायपालिका कानूनों तथा सरकारी कार्यों की
न्यायिक समीक्षा कर सकती है।सशस्त्र विद्रोह और हिंसक साधनों से सत्ता प्राप्त
करने का प्रयास इस संवैधानिक व्यवस्था के मूल सिद्धांतों से असंगत है। संवैधानिक
लोकतंत्र में किसी भी राजनीतिक समूह को यह अधिकार नहीं है कि वह अपनी वैचारिक
श्रेष्ठता या कथित जनसमर्थन के आधार पर लोकतांत्रिक प्रक्रिया का स्थान बल प्रयोग
को दे दे।अतः यह सिद्धांत स्पष्ट होना चाहिए: संवैधानिक संप्रभुता के अंतर्गत सशस्त्र
विद्रोह द्वारा सत्ता प्राप्त करने का कोई वैध स्थान नहीं है।
‘हम, भारत के लोग’ का वास्तविक अर्थ-संविधान की उद्देशिका जनता को संवैधानिक
व्यवस्था का मूल स्रोत स्वीकार करती है। इसका अर्थ यह नहीं कि प्रत्येक नागरिक या
संगठन को असीमित संप्रभु शक्ति प्राप्त है। जनता की संप्रभुता संविधान द्वारा
स्थापित संस्थाओं,
अधिकारों, कर्तव्यों और प्रक्रियाओं के माध्यम से अभिव्यक्त होती है।डॉ.
बी. आर. आंबेडकर ने 4
नवंबर 1948 को संविधान सभा में संवैधानिक नैतिकता के महत्त्व पर बल दिया
था। संवैधानिक नैतिकता का अर्थ केवल संविधान के शब्दों को स्वीकार करना नहीं, बल्कि उसकी संस्थाओं, प्रक्रियाओं और लोकतांत्रिक मर्यादाओं
का सम्मान करना भी है।इसलिए सरकार की आलोचना करना, निर्वाचन आयोग से जवाबदेही माँगना, न्यायिक समीक्षा की माँग करना और
शांतिपूर्ण आंदोलन करना लोकतांत्रिक अधिकारों का हिस्सा हो सकता है। लेकिन इन
अधिकारों का हवाला देकर हिंसा, सशस्त्र
विद्रोह अथवा गैरकानूनी तरीकों से सत्ता प्राप्त करने को उचित नहीं ठहराया जा
सकता।
लोकतांत्रिक
असहमति और संवैधानिक मर्यादा-भारत
में राजनीतिक परिवर्तन का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव हैं।
यदि किसी राजनीतिक दल या नागरिक समूह को सरकार की नीतियों, निर्वाचन प्रक्रिया या संवैधानिक
संस्थाओं के कामकाज पर आपत्ति है, तो
उसे शांतिपूर्ण विरोध,
न्यायिक उपचार, सार्वजनिक विमर्श और लोकतांत्रिक
प्रक्रिया का सहारा लेना चाहिए। जब निर्वाचन आयोग से संबंधित कोई विवाद सर्वोच्च न्यायालय के
समक्ष विचाराधीन हो,
तब संवैधानिक नैतिकता यह अपेक्षा करती
है कि सभी राजनीतिक दल न्यायपालिका में विश्वास बनाए रखें और न्यायिक प्रक्रिया के
परिणाम की प्रतीक्षा करें। न्यायालय में लंबित विषयों पर जनमत को प्रभावित करने के
उद्देश्य से चलाए जाने वाले मीडिया ट्रायल तथा अप्रमाणित आरोप संवैधानिक संस्थाओं
की निष्पक्षता पर अनावश्यक प्रश्न खड़े कर सकते हैं। लोकतंत्र में असहमति और
आलोचना का अधिकार महत्त्वपूर्ण है, किंतु उसके साथ संस्थागत मर्यादा और जिम्मेदारी भी आवश्यक है।
न्यायपालिका में आस्था,
तथ्यों पर आधारित विमर्श और न्यायिक
प्रक्रिया के प्रति संयम ही संवैधानिक लोकतंत्र की वास्तविक कसौटी हैं।भारत की
संवैधानिक संप्रभुता किसी एक राजनीतिक दल,
सरकार,
विपक्ष,
संगठन या विचारधारा की संपत्ति नहीं है।
यह उस संवैधानिक व्यवस्था में निहित है जिसे भारत के लोगों ने स्वीकार किया
है।सत्ता परिवर्तन लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है,
लेकिन उसका औचित्य और तरीका
महत्त्वपूर्ण है। शांतिपूर्ण असहमति लोकतंत्र को मजबूत करती है; हिंसा
और सशस्त्र विद्रोह उसकी संस्थागत नींव को चुनौती देते हैं।भारत में सरकारें बदल
सकती हैं, नीतियाँ बदल सकती हैं और राजनीतिक विचारधाराएँ बदल सकती हैं; लेकिन
सत्ता प्राप्त करने की प्रक्रिया संविधान के अधीन ही रहनी चाहिए। संवैधानिक
संप्रभुता की रक्षा का अर्थ है—लोकतांत्रिक असहमति का सम्मान करना और साथ ही
सशस्त्र विद्रोह द्वारा सत्ता प्राप्त करने की अवधारणा को अस्वीकार करना।
सूर्य प्रताप सिंह राजावत
अधिवक्ता,
राजस्थान उच्च न्यायालय, जयपुर
Comments
Post a Comment