भारत के हम लोग: संवैधानिक संप्रभुता और सत्ता परिवर्तन का प्रश्न
भारत के हम लोग: संवैधानिक संप्रभुता और
सत्ता परिवर्तन का प्रश्न
भारत के संविधान की उद्देशिका
(प्रस्तावना) की शुरुआत “हम, भारत के लोग” शब्दों से होती है। इसलिए
क्या सभी नागरिक यह मान सकते हैं कि भारत में वे ही संप्रभु हैं? संविधान की उद्देशिका की इन प्रारंभिक पंक्तियों का प्रायः यही
अर्थ निकाला जाता है।आज, जब हम भारतीय संविधान के 75 वर्षों की यात्रा पर दृष्टिपात करते हैं, तो इन शब्दों की व्याख्या अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो जाती है।
इसका कारण यह है कि वर्तमान समय में इन शब्दों को आधार बनाकर युवाओं से आगे आने और
सत्ता परिवर्तन का समर्थन करने का आह्वान किया जा रहा है।
‘सत्ता
परिवर्तन’ की
अभिव्यक्ति अपने भीतर अनेक अर्थ समेटे हुए है। कुछ लोग इस माँग का समर्थन करते हुए
यह तर्क देते हैं कि सरकार बदलना देश के नागरिकों का ऐसा अधिकार है, जिसकी गारंटी संविधान देता है। हालाँकि, ऐसे
कथन संदर्भ से हटकर प्रस्तुत किए जाते हैं और संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या
उनके व्यापक संवैधानिक संदर्भ से अलग करके की जाती है।
यह स्थिति कुछ-कुछ छद्म विज्ञापन अथवा
प्रॉक्सी अभियान जैसी है, जिसमें विज्ञापन का प्रत्यक्ष उद्देश्य किसी
विशेष उत्पाद, जैसे सोडा, का
प्रचार करना दिखाई देता है, लेकिन वास्तविक उद्देश्य किसी विशेष
ब्रांड की शराब का प्रचार करना होता है। पान मसाला और गुटखा के छद्म विज्ञापनों
में भी यही प्रवृत्ति देखने को मिलती है।ऐसा देखा गया है कि सत्ता परिवर्तन के लिए
अपनाई जाने वाली कथित रणनीति में कई चरण शामिल हो सकते हैं। इनमें किसी मुद्दे की
पहचान करना; गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) सहित विभिन्न समूहों का गठन करना; आंदोलन
को नेतृत्वविहीन और चेहराविहीन स्वरूप देने के लिए सोशल मीडिया अभियान चलाना;
यह धारणा निर्मित करना कि संविधान और उसकी संस्थाएँ प्रभावी
ढंग से कार्य नहीं कर रही हैं; यह प्रचारित करना कि चुनावों में धाँधली
होती है और न्यायपालिका समझौता कर चुकी है; सहानुभूति
प्राप्त करने के लिए युवाओं और महिलाओं को अग्रिम पंक्ति में रखना; सेवारत अथवा सेवानिवृत्त नौकरशाहों, उच्च
न्यायालयों एवं सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीशों तथा पुलिस और
सशस्त्र बलों के सदस्यों का समर्थन प्राप्त करना; और
अंततः सत्ता परिवर्तन करके ऐसे राजनीतिक प्रतिनिधियों को स्थापित करने का प्रयास
करना, जो दूसरों के इशारे पर कार्य करें।
वर्तमान समय में भारत में विपक्षी
राजनीतिक दल सत्ता परिवर्तन के लिए अत्यधिक आतुर दिखाई देते हैं।ऐसी स्थिति में
देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी, कांग्रेस
और उसके सहयोगी दल यह भूलते हुए प्रतीत होते हैं कि भारत में एक संविधान है,
जिसका उद्देश्य भारत की संप्रभुता की रक्षा करना है। भारत के
लोगों का प्रतिनिधित्व संसद और राज्य विधानमंडलों के माध्यम से एक सुव्यवस्थित
व्यवस्था द्वारा किया जाता है, जिसे चुनाव कहा जाता है। संसद द्वारा
विधिवत प्रक्रिया का पालन करते हुए पारित किसी भी कानून की न्यायिक समीक्षा की जा
सकती है। यहाँ तक कि न्यायपालिका भी स्वयं को संप्रभु नहीं कह सकती।
इससे एक मूलभूत प्रश्न उठता है—भारत
में संप्रभु कौन है?इसका
उत्तर यह है कि भारत में संविधान सर्वोच्च है। लेकिन जब हम कहते हैं कि संविधान
संप्रभु है, तो इसका वास्तविक अर्थ क्या है? न तो विधायिका और न ही संसद स्वयं को निरपेक्ष संप्रभुता का
अधिकारी मान सकती है। कार्यपालिका के संदर्भ में तो ऐसा दावा करने का प्रश्न ही
नहीं उठता।
इसका उत्तर उस संविधान के अर्थ और
महत्त्व की सही समझ में निहित है, जिसे हम, भारत
के लोगों ने, 26 नवंबर 1949 को
अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित किया तथा जो 26
जनवरी 1950 को लागू हुआ। हमारे संविधान की सार्थक
समझ का मूल तत्त्व यही है।इसलिए, भारत की विधिक व्यवस्था की संरचना और
संवैधानिक योजना को समझने के लिए संविधान का मूल संरचना सिद्धांत (Basic Structure
Doctrine) आधारभूत महत्त्व रखता है। भारत में
संवैधानिक संप्रभुता सर्वोपरि है।
संविधान शक्तियों के पृथक्करण के मूल
सिद्धांत को समाहित करता है, जिसके अंतर्गत विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका को अलग-अलग भूमिकाएँ सौंपी गई हैं।
इनकी शक्तियाँ, कार्य और कर्तव्य संविधान द्वारा
निर्धारित किए गए हैं।इसी प्रकार, विधायिका का गठन निर्वाचन प्रक्रिया के
माध्यम से होता है। निर्वाचित प्रतिनिधियों से बनी ऐसी सरकार, जिसे संसद में सदन का विश्वास प्राप्त हो, सामान्यतः पाँच वर्ष के कार्यकाल के लिए पद पर रहती है,
बशर्ते वह सदन का विश्वास बनाए रखे। संवैधानिक व्यवस्था के
अनुसार यही सिद्धांत राज्य विधानमंडलों के संदर्भ में भी लागू होता है। दूसरी ओर,
न्यायपालिका को न्यायनिर्णयन की शक्ति प्रदान की गई है।यह
स्मरण करना उचित होगा कि डॉ. बी. आर. आंबेडकर ने 4 नवंबर
1948 को कहा था कि भारत में संवैधानिक
नैतिकता कोई स्वाभाविक भावना नहीं है; इसे
विकसित और पोषित करने की आवश्यकता है।संवैधानिक नैतिकता का सार अत्यंत सरल
है—सत्तारूढ़ दल के साथ-साथ विपक्षी दलों द्वारा भी संवैधानिक संस्थाओं का सम्मान
किया जाना चाहिए। तभी संविधान अपनी वैधता बनाए रख सकता है और उसे पवित्र एवं
सर्वोच्च मान्यता प्राप्त हो सकती है। यदि सत्तारूढ़ दल और विपक्ष, दोनों का संविधान के प्रति विश्वास समाप्त हो जाए, तो लिखित संविधान अपना अर्थ और प्रभावशीलता खोने के जोखिम का
सामना करता है।
वर्तमान परिस्थितियों में विपक्ष का
व्यवहार ऐसा प्रतीत होता है, मानो निर्वाचन आयोग के कामकाज के संबंध
में उसके पास कोई उपाय ही उपलब्ध न हो। लेकिन जब कोई मामला सर्वोच्च न्यायालय के
समक्ष विचाराधीन हो, तो क्या सर्वोच्च न्यायालय की ओर कूच
करने वाले राजनीतिक मार्च को एक संवैधानिक लोकतंत्र में उचित माना जा सकता है?
ऐसी परिस्थितियों में राजनीतिक दलों द्वारा भारत के मुख्य
न्यायाधीश को पत्र लिखने की औचित्यता क्या है?
राजनीतिक दल यह भूलते हुए प्रतीत होते
हैं कि उनका अपना अस्तित्व भी संविधान पर ही निर्भर करता है। अंतरराष्ट्रीय
संवैधानिक विशेषज्ञ लॉरेंस हाइड (Laurance Hide) के
अवलोकन के अनुसार, संविधान केवल स्याही से नहीं लिखा जाता,
बल्कि उसका अर्थ उन रक्तरंजित संघर्षों और बलिदानों से भी
निर्मित होता है, जिनके माध्यम से संवैधानिक स्वतंत्रताएँ
सुरक्षित की जाती हैं। संविधान का एक गहनतर महत्त्व है, जिसे
अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए।संविधान के निर्माण में भाग लेने वाली संविधान सभा के
सभी सदस्यों ने अलग-अलग रूपों में स्वतंत्रता संग्राम में योगदान दिया था। वे
राष्ट्र के प्रति समर्पित थे।भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को प्रायः एक अर्धसत्य के
रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यह कहा जाता है कि भारत को स्वतंत्रता केवल
याचिकाओं, शांतिपूर्ण असहयोग और बहिष्कार के
आंदोलनों के माध्यम से प्राप्त हुई तथा इसमें कोई रक्तपात नहीं हुआ। हालाँकि,
यह इतिहास का केवल एक पक्ष है।भारत का मूल संविधान, जिस पर संविधान सभा के सदस्यों ने 24 जनवरी
1950 को हस्ताक्षर किए थे, उसमें महात्मा गांधी के चित्र के साथ-साथ नेताजी सुभाष चंद्र
बोस और स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े अन्य व्यक्तित्वों के चित्रण भी हैं। ये चित्र
विदेशी शासन से भारतमाता—अर्थात् भारत—को मुक्त कराने के संघर्ष को दर्शाते हैं।
इन चित्रों का निर्माण शांतिनिकेतन के सुप्रसिद्ध एवं उच्च सम्मान प्राप्त कलाकार
नंदलाल बोस ने किया था।
इसलिए, युवाओं
के नाम पर अथवा राजनीतिक विरोध के अधिकार का सहारा लेकर राजनीतिक दलों को संविधान
के निर्माण और स्वतंत्रता प्राप्ति से जुड़े बलिदानों को नहीं भूलना चाहिए।
स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास हमें याद दिलाता है कि हमारा संविधान उन असंख्य
लोगों के बलिदानों का भार अपने भीतर समेटे हुए है, जिन्होंने
भारत की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। इस इतिहास की उपेक्षा करना
उन लोगों के बलिदानों की अनदेखी करना है, जिन्होंने
राष्ट्र के लिए संघर्ष किया।
भारत में सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया
चुनावों के माध्यम से ही संभव है। संवैधानिक व्यवस्था को दरकिनार करके अथवा उसे
कमजोर करके सत्ता परिवर्तन करने के किसी भी प्रयास को प्रारंभ में ही रोक दिया
जाना चाहिए।जुलाई 2026 में हुए विरोध-प्रदर्शनों के दौरान
अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप का मुद्दा भी सामने आया था। उस विशेष पहलू को भुलाया नहीं
जा सकता और उस पर गंभीरता से विचार किए जाने की आवश्यकता है।इसके अतिरिक्त,
सोशल मीडिया नई पीढ़ी को प्रभावित करने का एक शक्तिशाली माध्यम
बन गया है। युवा अवस्था में अनेक लोग क्रांतिकारी बनने की आकांक्षा रखते हैं और
भगत सिंह को अपना आदर्श मानते हैं। इस आयु में वे विभिन्न प्रभावशाली विचारों और
आख्यानों के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील भी हो सकते हैं।हालाँकि, स्वतंत्र भारत की निर्वाचित प्रतिनिधि सरकार की तुलना ब्रिटिश
औपनिवेशिक सरकार से करना अत्यंत अतार्किक और संवैधानिक दृष्टि से अस्थिर तर्क है।
ऐसी तुलनाओं पर उन सभी लोगों को प्रश्न उठाना चाहिए और उनका विरोध करना चाहिए,
जिनकी संविधान, लोकतंत्र और निर्वाचन प्रक्रिया में
आस्था है।
सूर्य
प्रताप
सिंह
राजावत
अधिवक्ता
राजस्थान
उच्च न्यायालय
जयपुर
9462294899
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