दशहरा विवाद और भारतीय पंथनिरपेक्षता का वास्तविक अर्थ
दशहरा विवाद और भारतीय पंथनिरपेक्षता का
वास्तविक अर्थ-संविधान सभा की बहसें,
धर्म की अवधारणा एवं भारत की सभ्यतागत
विरासत
दशहरे
के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी
आदित्यनाथ और असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा द्वारा पूजा-अर्चना किए जाने
को राजनीतिक दलों का एक वर्ग पंथनिरपेक्षता के आदर्शों के विपरीत बताता है। यह बहस
एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठाती है—क्या भारतीय पंथनिरपेक्षता का अर्थ सार्वजनिक
जीवन में अपनी सभ्यतागत एवं सांस्कृतिक विरासत की अभिव्यक्ति से परहेज करना है? अथवा
भारतीय संविधान धार्मिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक परंपराओं और आधुनिक
लोकतांत्रिक मूल्यों के बीच समन्वय स्थापित करने की गुंजाइश देता है?
इस
प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए संविधान की मूल प्रति, संविधान सभा की बहसों और भारतीय चिंतन
परंपरा का अध्ययन आवश्यक है। किसी संवैधानिक अवधारणा को समझने के लिए केवल उसके
प्रचलित राजनीतिक अर्थ पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है; उसके
ऐतिहासिक विकास, संवैधानिक प्रावधानों और निर्माताओं के विचारों को भी समझना
चाहिए।
भारतीय
संविधान केवल विधिक प्रावधानों का संकलन नहीं है। इसकी मूल हस्तलिखित एवं
चित्रांकित प्रति भारत की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक यात्रा को भी अभिव्यक्त करती है।
महान चित्रकार नंदलाल बोस के निर्देशन में तैयार इस प्रति को भारतीय कला, संस्कृति
और सभ्यतागत परंपराओं से प्रेरित चित्रों से अलंकृत किया गया। इनमें भगवान श्रीराम, माता
सीता और लक्ष्मण जी से संबंधित चित्र भी सम्मिलित हैं।
संविधान
सभा के सदस्यों ने 24 जनवरी 1950 को संविधान की मूल प्रति पर हस्ताक्षर
किए और संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ। यह तथ्य विचारणीय है कि
स्वतंत्र भारत के संविधान की कलात्मक अभिव्यक्ति में भारतीय सभ्यता की विविध
ऐतिहासिक परंपराओं को स्थान मिला। इससे यह समझना अधिक उपयुक्त है कि भारत की
संवैधानिक यात्रा अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से पूर्णतः विच्छिन्न
नहीं थी।इसी संदर्भ में प्रश्न उठता है कि किसी निर्वाचित जनप्रतिनिधि द्वारा
पूजा-अर्चना करना अपने आप में पंथनिरपेक्षता के विरुद्ध कैसे माना जा सकता है? इसका
उत्तर संबंधित आचरण, उसके उद्देश्य, राज्य की भूमिका और संवैधानिक दायित्वों
के आधार पर दिया जाना चाहिए, न कि केवल धार्मिक अभिव्यक्ति की
उपस्थिति के आधार पर।
भारतीय पंथनिरपेक्षता की अवधारणा को समझने के लिए 27 दिसंबर 1948 को संविधान सभा में हुई बहस विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है। इस
दिन एच. वी. कामथ ने राष्ट्रपति की शपथ के प्रारूप में संशोधन संख्या 1146 प्रस्तुत किया। उनका प्रस्ताव था कि शपथ के
प्रारंभिक शब्दों में ईश्वर के नाम का उल्लेख करने का विकल्प उपलब्ध हो। वैकल्पिक
रूप से व्यक्ति बिना धार्मिक उद्घोषणा के सत्यनिष्ठापूर्वक प्रतिज्ञान कर सकता था।कामथ
का तर्क था कि ईश्वर का उल्लेख करना अपने आप में किसी राज्य को धार्मिक राज्य नहीं
बनाता। उन्होंने भारतीय धार्मिक परंपराओं के उदाहरण देते हुए कहा कि ईश्वर के
प्रति आस्था विभिन्न समुदायों में अलग-अलग रूपों में व्यक्त होती है। उनके विचार
में भारत के पंथनिरपेक्ष राज्य की कल्पना का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि सार्वजनिक
जीवन से धार्मिक आस्था को पूरी तरह निषिद्ध कर दिया जाए। उन्होंने कहा भारत को
आध्यात्मिक स्वतंत्रता पर पहली चोट तब लगी जब सोमनाथ पर हमला हुआ।
इस
बहस में महावीर त्यागी ने भी धार्मिक आस्था और पंथनिरपेक्ष राज्य के संबंध पर अपने
विचार व्यक्त किए। उन्होंने उस धारणा पर आपत्ति जताई जिसके अनुसार पंथनिरपेक्ष
राज्य में ईश्वर का उल्लेख वर्जित होना चाहिए। उनके विचार में पंथनिरपेक्षता का
अर्थ किसी विशेष धर्म के प्रति पक्षपात किए बिना राज्य का संचालन करना है, न
कि नागरिकों की धार्मिक आस्था का निषेध करना।इसी संदर्भ में उन्होंने प्रश्न उठाया
कि यदि पंथनिरपेक्षता की व्याख्या इस प्रकार की जाए कि सार्वजनिक जीवन से धार्मिक
और सांस्कृतिक परंपराओं को पूरी तरह हटा दिया जाए, तो राजनीतिक स्वतंत्रता का क्या महत्त्व रह जाएगा? उन्होंने अपनी बात को रामराज्य की
अवधारणा से जोड़ते हुए कहा:“राजनीतिक
स्वतंत्रता का क्या महत्व है यदि ‘राम राज्य’ से भगवान को निकाल दिया गया तो भारत
राम-विहीन अयोध्या बन जाएगा।”इस कथन के माध्यम से त्यागी ने उस दृष्टिकोण पर
प्रश्न उठाया जिसके अनुसार पंथनिरपेक्षता का अर्थ धार्मिक प्रतीकों, आस्थाओं
और सांस्कृतिक परंपराओं को सार्वजनिक जीवन से पूर्णतः अलग कर देना है। उनके
विचारों में स्वराज केवल राजनीतिक सत्ता का हस्तांतरण नहीं था, बल्कि
भारत की आत्मा और सांस्कृतिक चेतना की स्वतंत्रता से भी जुड़ा था।इस बहस का
महत्त्व इस बात में है कि संविधान सभा के सदस्यों ने धार्मिक आस्था और पंथनिरपेक्ष
राज्य के संबंध पर विचार-विमर्श किया। त्यागी ने भारत की आध्यात्मिक विरासत, स्वतंत्रता
आंदोलन और स्वराज की अपनी अवधारणा का उल्लेख करते हुए राजनीतिक स्वतंत्रता के
व्यापक अर्थ पर विचार किया। उनके वक्तव्य का केंद्रीय भाव यह था कि भारत की
स्वतंत्रता को उसकी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना से अलग करके नहीं देखा जाना
चाहिए।
दशहरे
पर पूजा-अर्चना को लेकर उठी बहस हमें संविधान के मूल सिद्धांतों की ओर लौटने का
अवसर देती है। संविधान की मूल प्रति में नंदलाल बोस द्वारा अंकित सांस्कृतिक चित्र
और संविधान सभा में हुई बहसें हमें स्मरण कराती हैं कि भारत की संवैधानिक पहचान को
उसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, सांस्कृतिक विविधता और आधुनिक
लोकतांत्रिक मूल्यों—तीनों के संदर्भ में समझना चाहिए।भारतीय पंथनिरपेक्षता को
समझने के लिए सांस्कृतिक विरासत का निषेध आवश्यक नहीं है।
सूर्य प्रताप सिंह राजावत ,अधिवक्ता राजस्थान उच्च
न्यायालय जयपुर
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