संवैधानिक नैतिकता चौराहे पर-न्यायिक औचित्य, संस्थागत विश्वास और विधि का शासन
संवैधानिक नैतिकता चौराहे पर-न्यायिक औचित्य, संस्थागत
विश्वास और विधि का शासन
सर्वोच्च
न्यायालय के किसी कार्यरत न्यायाधीश द्वारा ऐसे विषय पर टिप्पणी करना, जो
उनके समक्ष विचाराधीन नहीं है—क्या यह न्यायिक औचित्य की सीमाओं के भीतर आता है? क्या
यह न्यायिक आत्म-संयम के सिद्धांत का उल्लंघन नहीं है? क्या
यह संवैधानिक नैतिकता के एक मूलभूत सिद्धांत का उल्लंघन नहीं है?यहाँ
न्यायिक दृष्टांत के सिद्धांत पर चर्चा करना प्रासंगिक है। संविधान पीठ ने 1965
AIR 1767 के मामले में कहा था—“इस बात पर बल देने की आवश्यकता शायद ही
हो कि न्यायिक औचित्य और शिष्टाचार की दृष्टि से यह आवश्यक है कि यदि किसी मामले
की सुनवाई कर रहे विद्वान एकल न्यायाधीश का यह मत हो कि उच्च न्यायालय के
पूर्ववर्ती निर्णयों—चाहे वे खंडपीठ के हों या एकल न्यायाधीश के—पर पुनर्विचार किए
जाने की आवश्यकता है, तो उन्हें एकल न्यायाधीश के रूप में बैठकर उस प्रश्न की जाँच
प्रारंभ नहीं करनी चाहिए, बल्कि मामले को खंडपीठ के समक्ष भेजना चाहिए या, उचित
मामले में, संबंधित अभिलेख मुख्य न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत करने चाहिए, ताकि
वे इस प्रश्न की जाँच के लिए एक बड़ी पीठ का गठन कर सकें। ऐसे मामलों से निपटने का
यही उचित और पारंपरिक तरीका है तथा यह न्यायिक शिष्टाचार और औचित्य के स्वस्थ
सिद्धांतों पर आधारित है।”अतः न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां द्वारा की गई टिप्पणियाँ न्यायिक अनुचितता की सीमा के निकट आती हुई प्रतीत होती हैं। यह
कहा जा सकता है कि न्यायमूर्ति भुइयां को भारत के संविधान के अधीन उन्हें दिलाई गई
शपथ की याद दिलाए जाने की आवश्यकता है।
अब
सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति लोकुर तथा अन्य
सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की प्रतिक्रिया पर विचार कीजिए, जिन्होंने
निर्वाचन आयोग के विरुद्ध लगाए गए आरोपों की जाँच के लिए एक आयोग का गठन किया है।
यह अत्यंत आश्चर्यजनक है कि जब यही विषय भारत के सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष
विचाराधीन है और मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ को अंतरिम उपाय के लिए कोई
पर्याप्त आधार संतोषजनक रूप से प्राप्त नहीं हुआ है,
तब उसी विषय-वस्तु पर एक सेवानिवृत्त
न्यायाधीश द्वारा आयोग का नेतृत्व किया जाना ऐसा प्रतीत होता है मानो उन्होंने
न्यायिक संयम और न्यायिक औचित्य की उपेक्षा की हो। यह न्यायपालिका की संस्था के
प्रति अविश्वास के मत
के समान प्रतीत होता है।उपर्युक्त
स्थिति उन व्यक्तियों द्वारा विधि के शासन के प्रति अविश्वास की आवश्यक
परिस्थितियाँ उत्पन्न करती है, जो स्वयं न्यायिक बिरादरी का हिस्सा रहे
हैं। एक कार्यरत न्यायाधीश हैं और दूसरे एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश। यह कहा जा सकता
है कि दोनों न्यायाधीशों के आचरण से उनकी गरिमा प्रभावित हुई है और न्यायपालिका के
प्रति, तथा न केवल सर्वोच्च न्यायालय बल्कि निर्वाचन आयोग जैसी
संवैधानिक संस्था के प्रति भी, जनता के विश्वास को आघात पहुँचाने का
प्रयास स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
इस
चर्चा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और मीडिया की भूमिका का उल्लेख किए बिना बात
अधूरी रहेगी। निर्वाचन आयोग के इस्तीफे की माँग भारत के संविधान के प्रति विश्वास
में कमी, विधि के शासन में विश्वास के अभाव तथा न्यायपालिका में विश्वास
की कमी की अभिव्यक्ति के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। वे निर्वाचन आयोग के
पदाधिकारियों को हटाने की उस संवैधानिक प्रक्रिया से अनभिज्ञ प्रतीत होते हैं, जो
संवैधानिक ढाँचे के भीतर निर्धारित है और संवैधानिक पदाधिकारियों पर लागू
सुरक्षा-व्यवस्था को प्रतिबिंबित करती है। यह लोकतंत्र के प्रति विश्वास की कमी का
संकेत है और संवैधानिक संस्थाओं का अपमान है।
इस
पूरे घटनाक्रम में मीडिया को भी निर्वाचन आयोग से संबंधित मामले की सुनवाई के
दौरान भारत के मुख्य
न्यायाधीश द्वारा की गई टिप्पणियों और मौखिक टिप्पणियों को प्रस्तुत करने के लिए
पूरी तरह दोषमुक्त नहीं किया जा सकता। न्यायालय की कार्यवाही का विवेकपूर्ण
मूल्यांकन किए बिना, बार और बेंच के बीच हुई बातचीत को इस प्रकार प्रस्तुत किया जा
रहा है मानो वे न्यायालय के निष्कर्ष हों। किंतु यदि ऐसी टिप्पणियाँ न्यायिक आदेश
में कहीं दर्ज नहीं हैं, तो उन्हें अंतिम न्यायिक निर्धारण के समान कानूनी पवित्रता
प्राप्त नहीं होती और उन्हें न्यायिक रूप से अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा
सकता।दूसरी ओर, मुख्य न्यायाधीश ने अंतरिम आदेश प्रदान करने से इनकार किया।
अतः मीडिया ट्रायल पहले ही प्रारंभ हो चुका है,
जिसमें विपक्ष के नेता, एक
कार्यरत न्यायाधीश और सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों के सेवानिवृत्त
न्यायाधीश—वे व्यक्ति जिन्हें लोकतंत्र को बनाए रखने और उसकी रक्षा करने का
दायित्व प्राप्त है—भारत की संवैधानिक चेतना से समझौता करने वाले व्यक्तियों के
रूप में प्रस्तुत किए जा रहे हैं।
लोकतंत्र
में विरोध के नाम पर और उपर्युक्त घटनाक्रम को देखते हुए, सेवानिवृत्त
न्यायाधीशों और नौकरशाहों के एक समूह ने निर्वाचन आयोग पर किए जा रहे हमले की
निंदा करते हुए एक पत्र लिखा है। यहाँ उन सेवानिवृत्त सर्वोच्च न्यायालय के
न्यायाधीशों के आचरण और भूमिका को लेकर भी प्रश्न उठता है, जो
निर्वाचन आयोग के समर्थन में सामने आए हैं।
जिस
प्रकार शांति की नैतिकता और युद्ध की नैतिकता को समान नहीं माना जा सकता, उसी
प्रकार विभिन्न संवैधानिक पदाधिकारियों के आचरण का मूल्यांकन भी उस परिस्थिति और
संदर्भ के आधार पर किया जाना चाहिए,
जिसमें वे कार्य करते हैं। इसलिए, दूसरे
समूह का स्वागत किया जाना चाहिए। उन्होंने भारत में उपलब्ध चुनावी सुरक्षा उपायों
का उल्लेख किया है, जिनमें मतदान केंद्रों पर मतदान एजेंटों की उपस्थिति, इलेक्ट्रॉनिक
वोटिंग मशीनों (EVMs) से संबंधित उचित प्रश्नों का उत्तर देने की तत्परता, EVMs की
सीलिंग और सुरक्षित अभिरक्षा, स्ट्रॉन्ग रूम की व्यवस्था तथा वोटर
वेरिफाएबल पेपर ऑडिट ट्रेल (VVPAT) प्रणाली के माध्यम से सत्यापन शामिल
हैं।यह स्मरण रखना उचित है कि
अच्छे लोगों की चुप्पी बुराई को अपने
अनुचित उद्देश्यों को जारी रखने के लिए प्रोत्साहित करती है। अतः
उच्च सद्गुणों वाले लोगों को अपनी क्षमता के अनुपात में और संवैधानिक औचित्य की
सीमाओं के भीतर संवैधानिक संस्थाओं की रक्षा करनी चाहिए।
मुझे डॉ. बी.
आर. अम्बेडकर की वह
बात स्मरण होती है, जिन्होंने 4 नवम्बर 1948 को कहा था कि भारत में संवैधानिक नैतिकता कोई स्वाभाविक भावना नहीं है; इसे विकसित
करना पड़ता है।इसके पश्चात्, 25 नवम्बर
1949 को उन्होंने संविधान सभा को सचेत करते हुए कहा कि भारत गणराज्य को तीन महत्वपूर्ण बातों का ध्यान रखना चाहिए। प्रथम, नायक-पूजा को संविधान के उद्देश्यों और आदर्शों की कीमत पर आगे नहीं बढ़ने दिया जाना चाहिए। द्वितीय, सामाजिक लोकतंत्र को समानता
और स्वतंत्रता के आधार-स्तम्भ के रूप
में स्थापित किया जाना चाहिए। और, सबसे महत्वपूर्ण, भारत गणराज्य में गैर-संवैधानिक उपायों का सहारा
लेने का कोई भी प्रयास, जिसमें ऐसे उपायों
की तुलना गांधीजी के आंदोलनों से करना अथवा निर्वाचित प्रतिनिधि सरकार की तुलना ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन से करना शामिल है, भारत द्वारा
प्राप्त स्वतंत्रता की मूल भावना को समझने में एक गंभीर भूल होगी।अतः उनकी चेतावनी केवल राजनीतिक तरीकों तक सीमित नहीं थी; वह संवैधानिक
लोकतंत्र और संवैधानिक तरीकों में आस्था को बनाए रखने के बारे में थी।
सूर्य
प्रताप
सिंह
राजावत ,
अधिवक्ता
राजस्थान
उच्च न्यायालय
जयपुर
9462294899
Comments
Post a Comment