संविधान स्याही से नहीं, रक्त से लिखा जाता है: संवैधानिक नैतिकता और संस्थागत गरिमा
संविधान
स्याही से नहीं, रक्त से लिखा जाता है: संवैधानिक नैतिकता और संस्थागत गरिमा
हाल
के दिनों में निर्वाचन आयोग चर्चा में है और यह प्रकरण संस्था की छवि तथा उसकी
वैधता को कमजोर करने के प्रयासों के संदर्भ में सामने आया है। यह पूरा प्रकरण हमें
स्मरण कराता है कि शांति की नैतिकता, युद्ध की नैतिकता और संविधान की
नैतिकता—इन तीनों को सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा होना चाहिए।दुर्भाग्यवश, यह
विवाद द इंडियन एक्सप्रेस में
प्रकाशित एक रिपोर्ट के बाद उत्पन्न हुआ, जिसमें निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह
संधू और विवेक जोशी के कथित विचारों के संबंध में यह कहा गया कि निर्वाचन आयोग की
कार्यप्रणाली और निर्णय-प्रक्रिया में लोकतांत्रिकता का अभाव था। दो निर्वाचन
आयुक्तों को इस बात का लाभ नहीं दिया जा सकता कि उन्हें असहमति व्यक्त करने का
तरीका ज्ञात नहीं था, क्योंकि असहमति व्यक्त करने का तरीका और
उसके लिए चुना गया समय दोनों ही महत्वपूर्ण होते हैं। किंतु गोपनीय पत्राचार को
मीडिया के साथ साझा करना किसी व्यक्ति का नहीं,
बल्कि पूरी संस्था का मीडिया ट्रायल
आमंत्रित करने के समान है।यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि संवैधानिक पदों
पर आसीन व्यक्ति, चाहे वह व्यक्तिगत दुर्भावना, अज्ञानता अथवा राजनीतिक उद्देश्य से
प्रेरित हो, संवैधानिक संस्थाओं की प्रतिष्ठा और गरिमा को नुकसान पहुँचाने
में कोई कसर न छोड़ें।
यह
प्रसंग डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर की उन प्रसिद्ध टिप्पणियों की याद दिलाता है, जो
उन्होंने 4 नवंबर 1948 को भारत में संवैधानिक नैतिकता के अभाव
के संदर्भ में की थीं। उन्होंने ग्रोटे को उद्धृत करते हुए कहा था:"संवैधानिक
नैतिकता का प्रसार केवल किसी समुदाय के बहुमत में ही नहीं, बल्कि
संपूर्ण समाज में होना स्वतंत्र और शांतिपूर्ण शासन की अनिवार्य शर्त है; क्योंकि
कोई भी शक्तिशाली और हठी अल्पसंख्यक,
अपने लिए प्रभुत्व स्थापित करने में
पर्याप्त रूप से सक्षम हुए बिना भी,
किसी स्वतंत्र संस्था के सुचारु संचालन
को असंभव बना सकता है।" उन्होंने आगे स्पष्ट किया कि ग्रोटे के अनुसार संवैधानिक
नैतिकता का अर्थ है:"संविधान के स्वरूपों और प्रक्रियाओं के
प्रति सर्वोच्च श्रद्धा; उन प्रक्रियाओं के अंतर्गत और उनकी
सीमाओं में कार्य करने वाले प्राधिकार के प्रति आज्ञाकारिता; साथ
ही खुले रूप में अपनी बात कहने की आदत, ऐसी
कार्रवाई जो केवल निश्चित कानूनी नियंत्रण के अधीन हो, और
उन प्राधिकारियों के सभी सार्वजनिक कार्यों की निर्बाध आलोचना का अधिकार। इसके साथ
ही, दलगत संघर्ष की कटुता के बीच प्रत्येक
नागरिक के मन में यह पूर्ण विश्वास भी होना चाहिए कि संविधान के स्वरूप और उसकी पवित्रता
उसके विरोधियों की दृष्टि में भी उतनी ही सुरक्षित रहेगी, जितनी
उसकी अपनी दृष्टि में।"
यह
उचित रूप से कहा जाता है कि किसी संवैधानिक पद पर नियुक्ति, विशेषकर
ऐसे पद पर जिसमें राष्ट्रीय उत्तरदायित्व निहित हो, व्यक्ति के चरित्र और योग्यता की
न्यूनतम कसौटी को पूरा करनी चाहिए। राष्ट्रीय चरित्र वाला व्यक्ति सदैव राष्ट्र को
सर्वोपरि रखेगा और व्यक्तिगत शिकायतों से ऊपर संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा को बनाए
रखेगा।इसे निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली के संदर्भ में भी देखा जा सकता है, जहाँ
निर्णय सर्वसम्मति से लिए जाते हैं। यदि मुख्य निर्वाचन आयुक्त श्री ज्ञानेश कुमार की
कथित तानाशाही के आरोपों में कोई सत्यता है,
तो दोनों निर्वाचन आयुक्तों को निर्णय
तक पहुँचने के समय तैयार की गई नोटशीट में दर्ज अपने असहमति के विचारों का उल्लेख
करना चाहिए। अतः सार्वजनिक क्षेत्र में लगाए गए इन आरोपों को स्थापित तथ्य के रूप
में स्वीकार करने के बजाय उनकी गंभीरता से जाँच और परीक्षण आवश्यक है।इस विवाद के
कारण विपक्षी दलों ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त श्री ज्ञानेश
कुमार के इस्तीफे की माँग भी की है। इसने विपक्षी दलों को
एक तैयार मुद्दा उपलब्ध करा दिया है। ऐसी माँगें राजनीतिक विमर्श की गुणवत्ता और
स्तर पर गंभीर प्रश्न खड़े करती हैं।
एक
छद्म युद्ध प्रारंभ हो गया है। विपक्षी नेतृत्व की राजनीतिक विफलता का आरोप
निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर मढ़ने का प्रयास किया जा रहा है। इसी क्रम में
अतीत में EVM और SIR के संबंध में उठाए गए प्रश्नों को पुनः
उठाया जा रहा है।राजनीतिक नेतृत्व इस आत्मावलोकन में विफल दिखाई देता है कि EVM और
SIR से संबंधित विषय न्यायिक परीक्षण के अधीन रहे हैं और माननीय
सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों में इन पर विचार किया जा चुका है। विपक्षी दलों का
यह दृष्टिकोण कि वे कानून और संवैधानिक संस्थाओं से ऊपर हैं, विधि
के शासन के प्रति अत्यंत निम्न स्तर के सम्मान को प्रतिबिंबित करता है।यह कहा जाता
है कि विधायिका के लिए लक्ष्मण रेखा के
रूप में मूल संरचना सिद्धांत है, जिसे माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने केशवानंद
भारती मामले में प्रतिपादित किया और जो न्यायिक समीक्षा के माध्यम से
संवैधानिक सीमाओं को सुनिश्चित करता है। लेकिन जब राजनेताओं द्वारा राष्ट्रीय
महत्व के विषयों और संस्थाओं के साथ व्यवहार करने की बात आती है, तब
उनकी लक्ष्मण रेखा
कहाँ है?
सत्ता
प्राप्त करने की अधीरता में राजनीतिक दल कभी-कभी ऐसी स्थिति में पहुँच जाते हैं
जहाँ संवैधानिक नैतिकता, संवैधानिक औचित्य तथा सार्वजनिक जीवन और
सार्वजनिक विमर्श में आत्म-संयम को राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी पर विजय प्राप्त करने
के उद्देश्य से एक ओर रख दिया जाता है।विपक्ष को यह स्मरण रखना चाहिए कि वह जितना
संविधान में विश्वास रखेगा, उतना ही जनता का विश्वास संविधान में
बना रहेगा। संवैधानिक संस्थाओं की वैधता और प्रतिष्ठा एक दिन में निर्मित नहीं
होती।टी. एन. शेषन ने स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने में निर्वाचन आयोग
की शक्ति और भूमिका को जिस प्रकार प्रदर्शित किया, वह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक
महत्वपूर्ण अध्याय है।असहमति का अधिकार प्रत्येक नागरिक और प्रत्येक राजनीतिक दल
का मौलिक अधिकार है, लेकिन यह अधिकार निरपेक्ष नहीं है। संविधान स्वयं इस अधिकार पर
युक्तियुक्त प्रतिबंधों की व्यवस्था करता है। सत्ता पक्ष और विपक्ष—दोनों के लिए
आचार-संहिता आवश्यक है और राष्ट्रीय महत्व की संस्थाओं, विशेषकर
निर्वाचन आयोग, के साथ व्यवहार करते समय अत्यधिक आत्म-संयम की अपेक्षा की जाती
है।अंततः लॉरेंस एच. ट्राइब की उस प्रसिद्ध पंक्ति को स्मरण करना सदैव उपयोगी है—“संविधान स्याही से नहीं, बल्कि रक्त से लिखा जाता है।”
सूर्य प्रताप सिंह राजावत
अधिवक्ता राजस्थान उच्च न्यायालय जयपुर
9462294899
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