बलिदान, इतिहास और चेतना : चित्तौड़ के जौहर से भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन तक
बलिदान, इतिहास
और चेतना : चित्तौड़ के जौहर से भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन तक
स्वरा भास्कर की हालिया टिप्पणियाँ,
जिनमें चित्तौड़ के जौहर को कायरता का कृत्य बताया गया है,
घृणा-भाषण (Hate Speech) अथवा
मानहानि (Defamation), या दोनों की श्रेणी में आती हैं। अतः यह
विषय न्यायिक परीक्षण की अपेक्षा करता है। देश का कानून स्पष्ट है। उक्त
टिप्पणियाँ भारतीय न्याय संहिता के अंतर्गत अपराध गठित करने वाले आवश्यक तत्वों को
पूरा करती हैं। मानहानिकारक एवं निंदनीय टिप्पणियों के संबंध में राजपूत सभा के
अध्यक्ष राम सिंह चांदलई ने स्वरा भास्कर को पत्र लिखा है। बताया जाता है कि वह
सोशल मीडिया पर ध्यान आकर्षित करने के लिए भारत-विरोधी टिप्पणियाँ करने के लिए
जानी जाती हैं।अश्विनी उपाध्याय प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए
निर्देशों के अनुसार, इस घृणा-भाषण के संबंध में अभी तक कोई
प्राथमिकी दर्ज होने की सूचना नहीं है। कुछ समय पूर्व, द्रविड़
मुनेत्र कड़गम (डीएमके) के नेता उदयनिधि स्टालिन ने सनातन धर्म के विरुद्ध
टिप्पणियाँ की थीं और आज तक, मद्रास उच्च न्यायालय की टिप्पणियों के
बावजूद, उनके विरुद्ध कोई प्राथमिकी दर्ज नहीं
की गई है। यह प्रवृत्ति एक ऐसे पैटर्न, एक
षड्यंत्र और एक ऐसी योजना को प्रदर्शित करती है, जिसका
उद्देश्य इस प्राचीन भूमि—भारत—के आदर्शों, मूल्यों
और संस्कृति को अपमानित करना है।
भारत में जन्म लेना, भारतीय परिवार में जन्म लेना और भारत में शिक्षित होना मात्र
इस बात के लिए पर्याप्त नहीं है कि कोई व्यक्ति भारत की आत्मा को जाने और उसकी
सराहना करे। कुछ लोग ऐसे व्यक्तित्व और आचरण को इस तथ्य से जोड़ सकते हैं कि उनका
समस्त आचरण वित्तपोषित या प्रायोजित है। लेकिन वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या ऐसे
आचरण को दंडित हुए बिना जाने दिया जा सकता है?भारत
का संविधान सभी नागरिकों को वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है।
लेकिन यह स्वतंत्रता निरपेक्ष नहीं है। यह सार्वजनिक व्यवस्था, शिष्टता या नैतिकता तथा मानहानि सहित संविधान द्वारा निर्धारित
उचित प्रतिबंधों के अधीन है।राज्य तथा उन संस्थाओं की ओर से कोई ऐसी चूक नहीं होनी
चाहिए, जो राजपूतों के बलिदान के गौरवशाली
इतिहास का प्रतिनिधित्व करती हैं, जिससे यह धारणा उत्पन्न हो कि उनके
द्वारा कही गई कोई भी बात न तो घृणा-भाषण थी और न ही मानहानि। अतः भारतीय मूल्यों
के प्रति बार-बार किए जाने वाले इस प्रकार के अपमान के इस विशेष प्रकरण को गंभीरता
से लिया जाना चाहिए, विशेष रूप से इसलिए कि इसका भविष्य में
निवारक प्रभाव (deterrent effect) होना आवश्यक है।
इतिहास का अध्ययन हमें प्रतिक्रिया के
तीन चरण प्रदान करता है। पहला, विरोध (Protest); दूसरा,
असहयोग (Non-Cooperation), अर्थात
शांतिपूर्ण साधनों के माध्यम से अपनी बात रखना; और
तीसरा, आरोपित व्यक्ति का बहिष्कार (Boycott)। लेकिन यदि ये उपाय भी गलत आचरण को रोकने में सफल नहीं होते,
तो आत्मरक्षा में कानून द्वारा अनुमत उपायों का सहारा लिया जा
सकता है; क्योंकि इसके बाद प्रश्न केवल आलोचना को
स्वीकार करने का नहीं रह जाता, बल्कि राजपूताना के महान एवं उदात्त
जीवन-मूल्यों की मानहानि और उनकी हत्या को रोकने का हो जाता है।स्वरा की
टिप्पणियों के लिए उनके प्रति दया दिखाने का कोई औचित्य नहीं है, क्योंकि न तो वे भोली हैं और न ही उन टिप्पणियों से अनभिज्ञ
हैं, जो उनके नाम से संबंधित हैं। जानबूझकर
और इच्छापूर्वक किया गया कदाचार दया का नहीं, बल्कि
निवारक प्रतिक्रिया का विषय है।
सहिष्णुता वीरों का गुण है, लेकिन एक सीमा के बाद सहिष्णुता भीतर स्थित दिव्यता का अपमान
बन जाती है। जौहर के रूप में किया गया बलिदान उस भूमि की संस्कृति का चरम स्वरूप
है, जहाँ शत्रु को केवल पराजय का सामना करना
पड़ा। जीवन के ऐसे उच्च आदर्शों को समझना उन लोगों के लिए कठिन है, जो चेतना के निम्न स्तर पर जीवन जीते हैं और जिनके लिए जीवन के
केवल पशुवत पक्षों का महिमामंडन ही जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य प्रतीत होता है।लेकिन
यह तर्क भी स्वरा के बचाव का आधार नहीं बन सकता। चाहे ऐसा हो, लेकिन किसी भी स्थिति में उनसे केवल अपने जीवन के आदर्शों या
अपनी चेतना को ऊँचा उठाने की अपेक्षा नहीं की जा रही है। लेकिन हाँ, उनसे यह अपेक्षा अवश्य है कि वे लक्ष्मण रेखा को पार न करें,
क्योंकि राजपूताना के आदर्शों में विश्वास रखने वाले लोग आज भी
जीवित हैं। और जब भी भारत के मूल्यों, संस्कृति,
संप्रभुता और सीमाओं की रक्षा का आह्वान होगा, तब समय के पास घटनाक्रम का साक्षी बने रहने के अतिरिक्त कोई
विकल्प नहीं होगा।निस्संदेह, उनकी टिप्पणियाँ उनके अंतर्मन की चेतना
का प्रतिबिंब हैं। लेकिन अगला प्रश्न यह है कि क्या ऐसी टिप्पणियाँ उन लोगों
द्वारा अनदेखी कर दी जाएँगी, जो आत्मबलिदान को सर्वोच्च सम्मान मानते
हैं?
जौहर को कायरता या जीवन से पलायन का
प्रतीक नहीं, जैसा कि स्वरा का मानना है, बल्कि महिला सशक्तिकरण के एक उदाहरण के रूप में देखा जा सकता
है, जहाँ महिलाओं की सहमति बल, अनुचित प्रभाव अथवा कपट से प्राप्त नहीं की जा सकती थी। यह
केवल रानी के उच्च मूल्यों का ही नहीं, बल्कि
राज्य की सभी महिलाओं के उच्च मूल्यों का भी प्रतीक है—एक ऐसा साझा मूल्य, जो केवल कुलीन वर्ग तक सीमित नहीं था, बल्कि
राज्य में रहने वाली समस्त प्रजा तक विस्तृत था।
ऐसे संस्कार को समझना और उसकी सराहना
करना उन महिलाओं के लिए सरल नहीं है, जैसे
स्वरा, जो इस विचारधारा के अनुसार केवल शरीर की
उन आवश्यकताओं के महिमामंडन को जानती हैं, जो
भोजन, निद्रा, भय
और मैथुन से आगे नहीं जातीं।आज समय की यह गंभीर आवश्यकता है कि अज्ञानता को आनंद
या सौभाग्य मानकर अनदेखा नहीं किया जा सकता, बल्कि
उसके अनुरूप आनुपातिक दंड पर विचार किया जाना चाहिए। वे क्षमा माँगती हैं या नहीं,
यह अलग प्रश्न है। वास्तविक प्रश्न यह है कि भारत कब तक ऐसे
लोगों द्वारा किए जाने वाले तिरस्कारपूर्ण, निंदनीय
और अपमानजनक व्यवहार को सहन करेगा, जो भारतीय नागरिक तो कहे जाते हैं,
लेकिन जिनका आचरण और चिंतन इसके विपरीत है?यह केवल राजपूतों को प्रभावित करने वाली समस्या नहीं है। विश्व
इतिहास के अध्ययन से यह निष्कर्ष निकलता है कि चित्तौड़ का शौर्य, साहस और बलिदान केवल भारत को ही नहीं, बल्कि
भारत की सीमाओं के बाहर के लोगों को भी प्रेरित करता है।
इतिहास का निष्पक्ष अध्ययन यह भी सिखाता
है कि समान लक्ष्य रखने वाले व्यक्तियों की रणनीतियाँ अलग-अलग हो सकती हैं।
मध्यकालीन भारत में महाराणा प्रताप और आमेर के राजा मानसिंह की राजनीतिक रणनीतियाँ
समान नहीं थीं। एक ने प्रत्यक्ष संघर्ष का मार्ग चुना, तो
दूसरे ने तत्कालीन साम्राज्य के साथ राजनीतिक संबंधों के भीतर अपनी भूमिका
निर्धारित की। ऐसी ऐतिहासिक भूमिकाओं का मूल्यांकन उस समय की परिस्थितियों और
उपलब्ध विकल्पों को समझकर किया जाना चाहिए।यही बात भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन पर भी
लागू होती है। कांग्रेस में नरम दल और गरम दल के तरीकों में बड़ा अंतर था, लेकिन दोनों धाराएँ विदेशी शासन से भारतीय हितों की रक्षा और
अंततः स्वशासन की दिशा में आगे बढ़ रही थीं। किसी को क्रमिक राजनीतिक सुधार
स्वीकार्य थे, जबकि दूसरे तत्काल और पूर्ण स्वतंत्रता
की माँग की ओर बढ़ रहे थे।श्रीअरविन्द ने बंग-भंग आंदोलन के समय स्वदेशी, बहिष्कार और स्वराज को राष्ट्रीय आंदोलन के महत्वपूर्ण साधनों
के रूप में प्रस्तुत किया। महात्मा गांधी ने हिन्द स्वराज में
स्वराज की अपनी विशिष्ट अवधारणा रखी। भगत सिंह, राजगुरु
और सुखदेव ने स्वतंत्रता के अपने आदर्श के लिए फाँसी स्वीकार की। नेताजी
सुभाषचन्द्र बोस ने भारत से बाहर जाकर आजाद हिन्द फौज के माध्यम से ब्रिटिश शासन
को चुनौती देने का मार्ग चुना।मार्ग अलग थे, लेकिन
भारत की स्वतंत्रता केंद्रीय लक्ष्य थी।
इतिहास में किसी व्यक्ति के एक निर्णय
को उसके पूरे जीवन से अलग करके देखना कई बार भ्रामक परिणाम देता है। महात्मा गांधी
द्वारा असहयोग आंदोलन प्रारंभ करना महत्वपूर्ण था, लेकिन
चौरी-चौरा की हिंसक घटना के बाद उसी आंदोलन को वापस लेना भी उनका निर्णय था। इससे
गांधीजी की ऐतिहासिक भूमिका समाप्त नहीं हो जाती।इसी प्रकार, अंडमान की सेल्युलर जेल में कठोर यातनाएँ सहने वाले
क्रांतिकारियों की याचिकाओं का मूल्यांकन भी जेल की परिस्थितियों, उनकी रणनीति और आगे की राजनीतिक संभावनाओं के संदर्भ में होना
चाहिए। राष्ट्र के लिए मृत्यु स्वीकार करना बलिदान हो सकता है, लेकिन किसी बड़े उद्देश्य के लिए जीवित रहकर संघर्ष जारी रखना
भी रणनीति हो सकती है।युद्ध और राष्ट्रीय आंदोलनों में लक्ष्य, साधन, परिस्थिति और रणनीति—चारों को एक साथ
समझना आवश्यक है।इसी दृष्टि से चित्तौड़ के जौहर, हल्दीघाटी
के युद्ध, भगत सिंह की फाँसी, सावरकर की कालापानी की सजा, श्रीअरविन्द
के पांडिचेरी प्रवास, चौरी-चौरा के बाद आंदोलन की वापसी,
गांधी-अम्बेडकर पूना समझौता, द्वितीय
विश्वयुद्ध में भारतीय सैनिकों की भूमिका और भारत विभाजन से जुड़े निर्णयों को
उनके ऐतिहासिक संदर्भों से काटकर नहीं समझा जाना चाहिए।
सूर्यप्रताप सिंह राजावत
अधिवक्ता, राजस्थान उच्च न्यायालय, जयपुर
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