विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस : श्रीअरविन्द का प्रथम स्वप्न और अखंड भारत-बोध
विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस : श्रीअरविन्द का प्रथम स्वप्न और अखंड
भारत-बोध
“भारत
आज स्वतंत्र है, पर उसने एकता प्राप्त नहीं की है, केवल एक खंडित स्वतंत्रता प्राप्त की है।” —
श्रीअरविन्द, 15 अगस्त 1947
15
अगस्त 1947 भारत की स्वतंत्रता का दिन था और श्रीअरविन्द
का 75वाँ जन्मदिवस भी। इस ऐतिहासिक अवसर पर अपने
प्रसिद्ध संदेश में उन्होंने अपने “पाँच स्वप्नों” का उल्लेख किया। उनका प्रथम
स्वप्न था—भारत की स्वतंत्रता और एकता। उन्होंने स्वतंत्रता का स्वागत किया, किंतु विभाजन को भारत की अंतिम नियति नहीं
माना। उनका विश्वास था कि विभाजन समाप्त होना चाहिए और भारत की एकता पुनः स्थापित
होनी चाहिए।इसीलिए विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस केवल 1947 की त्रासदी का स्मरण नहीं, बल्कि भारत की एकता पर पुनर्विचार का अवसर भी
है। यह उन लाखों लोगों की पीड़ा का स्मरण है जिनके घर उजड़े, परिवार बिछड़े, जीवन नष्ट हुए और सदियों पुराने सामाजिक-सांस्कृतिक संबंध राजनीतिक
सीमाओं से काट दिए गए।
विभाजन की पीड़ा समझने के लिए श्रीअरविन्द का राष्ट्र-बोध महत्वपूर्ण
है। वे पूछते हैं—“राष्ट्र क्या है? हमारी
जन्मभूमि क्या है?” उनके लिए राष्ट्र जमीन का टुकड़ा, कोई नाम अथवा मन की कल्पना नहीं, बल्कि उन करोड़ों लोगों की सम्मिलित जीवंत
शक्ति है जिनसे राष्ट्र बनता है।उन्होंने इसकी तुलना महिषासुरमर्दिनी भवानी से की।
जिस प्रकार देवताओं की सम्मिलित शक्ति से भवानी प्रकट हुईं, उसी प्रकार करोड़ों भारतीयों की सम्मिलित शक्ति
“भवानी भारती” है। इस दृष्टि से 1947
में केवल भूमि नहीं बँटी;
भारत की सभ्यतागत चेतना को भी गहरा आघात
पहुँचा। इसलिए अखंडता का प्रश्न भूगोल के साथ भारत-बोध की अखंडता का भी प्रश्न है।
विभाजन की कहानी 1947 से
शुरू नहीं होती। 1942 का क्रिप्स मिशन इसका महत्वपूर्ण पड़ाव था। 31 मार्च 1942 को
श्रीअरविन्द ने सर स्टैफर्ड क्रिप्स को संदेश भेजकर उनके प्रस्तावों का स्वागत
किया। उन्होंने भारतीय नेतृत्व से इन्हें बातचीत का आधार बनाने का आग्रह किया तथा
अपने प्रतिनिधि के माध्यम से महात्मा गांधी, जवाहरलाल
नेहरू और सी. राजगोपालाचारी तक अपना दृष्टिकोण पहुँचाने का प्रयास
किया।श्रीअरविन्द स्वतंत्रता के साथ भारत की भावी एकता और सुरक्षा को भी देख रहे
थे। क्रिप्स मिशन विफल हो गया। इसलिए इतिहास में प्रश्न बना हुआ है—क्या 1942 में भारत ने ऐसा अवसर खो दिया जिससे विभाजन को
टालने की संभावना बन सकती थी? इसे
निश्चित निष्कर्ष के बजाय गंभीर ऐतिहासिक प्रश्न के रूप में देखना उचित है।
1946 का
नोआखली आने वाली विभीषिका की भयावह चेतावनी था। कलकत्ता, नोआखली, बिहार
और पंजाब की सांप्रदायिक हिंसा ने दिखाया कि राजनीतिक मतभेद जब धार्मिक भय, सामुदायिक अविश्वास और प्रतिशोध में बदलते हैं, तब सामाजिक एकता तेजी से नष्ट होती है।इसलिए
विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस का उद्देश्य किसी वर्तमान समुदाय के विरुद्ध आक्रोश
उत्पन्न करना नहीं, बल्कि उस विभाजनकारी मानसिकता को पहचानना और अस्वीकार
करना है जो भारतीय को भारतीय के विरुद्ध खड़ा करती है।
वीर सावरकर के “दो राष्ट्र” संबंधी विचारों और पाकिस्तान की माँग के
बीच अंतर करना आवश्यक है। हिंदू और मुसलमानों को अलग राजनीतिक-सांस्कृतिक राष्ट्र
मानने संबंधी उनके कथन को सीधे भारत के भौगोलिक विभाजन की माँग नहीं माना जा सकता।
सावरकर पाकिस्तान निर्माण और भारत के क्षेत्रीय विखंडन के विरोधी थे।अतः दो
राष्ट्रों की अवधारणा और पाकिस्तान की माँग समान नहीं थीं। यह अंतर विभाजन के
इतिहास को निष्पक्ष रूप से समझने के लिए महत्वपूर्ण है।
डॉ. बी. आर. अम्बेडकर ने पाकिस्तान के प्रश्न का विश्लेषण कठोर
राजनीतिक यथार्थ के आधार पर किया। उनका महत्वपूर्ण प्रश्न था—यदि धर्म के आधार पर
देश विभाजित होता है तो दोनों ओर रहने वाले अल्पसंख्यकों का भविष्य क्या होगा? उन्होंने जनसंख्या के हस्तांतरण के विकल्प पर
भी गंभीरता से विचार किया। तत्कालीन राष्ट्रीय नेतृत्व व्यापक अनिवार्य जनसंख्या
हस्तांतरण के पक्ष में नहीं था। 1947 के
विशाल विस्थापन ने अंततः दिखाया कि सीमाएँ कागज पर खींची जा सकती हैं, लेकिन सदियों से बसे समाजों को विभाजित करने की
मानवीय कीमत भयावह होती है।
मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में मुस्लिम लीग ने दो-राष्ट्र
सिद्धांत को पाकिस्तान की माँग का राजनीतिक आधार बनाया। किंतु प्रश्न है—क्या
पाकिस्तान बनने से राष्ट्रीय पहचान और सांप्रदायिक विभाजन की समस्या समाप्त हो गई?1971 में पूर्वी पाकिस्तान का अलग होकर बांग्लादेश
बनना इस धारणा की सीमाएँ सामने लाता है कि केवल धार्मिक समानता स्थायी राष्ट्रीय
एकता सुनिश्चित कर सकती है। भाषा, संस्कृति, राजनीतिक अधिकार, आर्थिक न्याय और क्षेत्रीय अस्मिता भी राष्ट्र-निर्माण के महत्वपूर्ण
आधार हैं। इस अर्थ में बांग्लादेश का जन्म दो-राष्ट्र सिद्धांत की ऐतिहासिक सीमाओं
का महत्वपूर्ण प्रमाण है।
श्रीअरविन्द ने हिंदू-मुस्लिम प्रश्न को केवल राजनीतिक सत्ता-संघर्ष
नहीं माना। उनके अनुसार वास्तविक समस्या दो ऐतिहासिक सभ्यताओं के संबंध की भी थी।
उन्होंने इसके दो संभावित समाधान देखे—एक उच्चतर आध्यात्मिक सिद्धांत, जो दोनों में समन्वय स्थापित करे; अथवा ऐसी राजनीतिक देशभक्ति, जो धार्मिक संघर्ष से ऊपर उठकर दोनों समुदायों
को राष्ट्रीय चेतना में बाँध दे।यह विचार विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस को वर्तमान
से जोड़ता है—विभाजन को याद करने का उद्देश्य नया विभाजन पैदा करना नहीं, बल्कि उन कारणों को पहचानना है जिन्होंने भारत
को विभाजित किया।
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने संस्कृति के चार अध्याय में
भारतीय इतिहास को संघर्ष से अधिक समन्वय और आत्मसातीकरण की प्रक्रिया के रूप में
देखा। हिंदू-मुस्लिम संबंधों के संदर्भ में शेख अहमद सरहिंदी का प्रसंग महत्वपूर्ण
है। अकबर के समय विकसित धार्मिक-सांस्कृतिक समन्वय के विपरीत सरहिंदी ने धार्मिक
पृथकता और रूढ़िवादी आग्रह पर बल दिया। बाद में शेख सैफुद्दीन भी उस वैचारिक धारा
से जुड़े दिखाई देते हैं जिसने मुगल सत्ता को अधिक रूढ़िवादी दिशा की ओर प्रेरित
किया।अतः मध्यकालीन इतिहास को केवल “हिंदू बनाम मुस्लिम” के सरल द्वंद्व में नहीं
बाँटा जा सकता। मुस्लिम समाज के भीतर भी दो धाराएँ थीं—समन्वय और पृथकता। एक ओर
अकबर और दारा शिकोह जैसे व्यक्तित्व थे, दूसरी
ओर धार्मिक पृथकता पर जोर देने वाली शक्तियाँ।
दारा शिकोह ने उपनिषदों का फारसी अनुवाद कराया और मज्मा-उल-बहरैन—“दो
समुद्रों का संगम”—में हिंदू और इस्लामी आध्यात्मिक परंपराओं के बीच संवाद खोजा।
इसलिए दारा भारतीय सभ्यतागत समन्वय के महत्वपूर्ण प्रतीक बनते हैं।इसके विपरीत
औरंगजेब से जुड़ी ऐतिहासिक स्मृति का एक पक्ष धार्मिक रूढ़िवाद से संबंधित है। एक
रोचक विरोधाभास यह है कि औरंगजेब के अंतिम निर्देशों से संबंधित विवरणों में उसकी
मृत्यु के बाद साम्राज्य को उसके तीन पुत्रों के बीच बाँटने के सुझाव का उल्लेख
मिलता है। अर्थात राजनीतिक साम्राज्य की एकता भी अंततः स्थायी नहीं थी।यहीं दारा
और औरंगजेब दो व्यक्तियों से आगे दो प्रवृत्तियों के प्रतीक बन जाते हैं—समन्वय और
पृथकतावाद।
विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस प्रतिशोध का नहीं, स्मृति, आत्ममंथन
और राष्ट्रीय संकल्प का दिवस है। विभाजन की सबसे बड़ी शिक्षा है कि सांप्रदायिक
पृथकतावाद, अविश्वास और राजनीतिक विखंडन की अंतिम कीमत
सामान्य मनुष्य चुकाता है।अखंड भारत को इसलिए केवल भूगोल की पुनर्कल्पना नहीं
समझना चाहिए। वह सबसे पहले अखंड भारत-बोध की पुनर्स्थापना है—एक ऐसी चेतना जिसमें
विविधता हो लेकिन विखंडन नहीं, धार्मिक
आस्था हो लेकिन पृथकतावाद नहीं और इतिहास की स्मृति हो लेकिन प्रतिशोध नहीं।
इसी अर्थ में कहा जा सकता है—भारत-बोध में दारा शिकोह की समन्वयकारी
चेतना का पुनर्जागरण और औरंगजेबी असहिष्णुता की प्रवृत्ति का निष्कासन आवश्यक है।15 अगस्त 1947 को
विभाजन की पीड़ा के बीच श्रीअरविन्द ने निराशा नहीं, भविष्य का स्वप्न दिया—स्वतंत्र और पुनः एक भारत का स्वप्न।अतः
विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस(14 अगस्त ) का संकल्प होना चाहिए—विभाजन को स्मरण करें, विभीषिका से सीखें, पृथकतावादी मानसिकता को अस्वीकार करें और भारत
की सभ्यतागत एकता को सुदृढ़ करें।विभाजन इतिहास की पीड़ा है; अखंड भारत-बोध भविष्य का संकल्प।
सूर्य
प्रताप
सिंह
राजावत
अधिवक्ता
राजस्थान
उच्च न्यायालय
जयपुर 9462294899
Comments
Post a Comment