श्रीअरविंद: राष्ट्रवाद के पैगम्बर और मानवता के प्रेमी
श्रीअरविंद: राष्ट्रवाद के पैगम्बर और मानवता
के प्रेमी
"वे केवल इस न्यायालय के कटघरे में नहीं खड़े हैं, बल्कि इतिहास के उच्च न्यायालय के समक्ष खड़े
हैं।" ये अमर शब्द देशबंधु चित्तरंजन (सी. आर.) दास ने अलीपुर बम षड्यंत्र
मुकदमे (1908–1909) में श्रीअरविंद की पैरवी करते हुए कहे थे।
उन्होंने न्यायालय से आग्रह किया कि वह तत्कालीन आरोपों से ऊपर उठकर उस महान
व्यक्तित्व को पहचाने, जो भविष्य में भारत और विश्व के लिए प्रेरणा
बनेगा। उन्होंने भविष्यवाणी की थी कि जब उस समय के सभी राजनीतिक विवाद और आंदोलन
इतिहास बन जाएंगे, तब श्रीअरविंद को "देशभक्ति के कवि, राष्ट्रवाद के पैगम्बर और मानवता के
प्रेमी" के रूप में स्मरण किया जाएगा। एक शताब्दी से अधिक समय बाद इतिहास ने
उनकी इस भविष्यवाणी को सत्य सिद्ध कर दिया है।(सी.आर. दास का जीवन और समय, पृष्ठ 49)
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अगस्त 1872 को कोलकाता में जन्मे श्रीअरविंद का जीवन भारत
के राष्ट्रीय जागरण का पर्याय है। उनके जन्मदिवस का महत्व उस समय और बढ़ गया जब 15 अगस्त 1947 को
भारत स्वतंत्र हुआ। इस प्रकार 15
अगस्त केवल भारत का स्वतंत्रता दिवस ही नहीं, बल्कि
श्रीअरविंद की जयंती भी है। यह ऐतिहासिक संयोग भारत के स्वतंत्र और गौरवशाली
भविष्य की उनकी आजीवन साधना का प्रतीक माना जाता है।
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में श्रीअरविंद का स्थान अत्यंत विशिष्ट
है। जब अधिकांश राष्ट्रीय नेता ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर सीमित सुधारों की मांग
कर रहे थे, तब श्रीअरविंद ने सबसे पहले पूर्ण स्वराज का
स्पष्ट और निर्भीक उद्घोष किया। वंदे मातरम् और कर्मयोगिन जैसे समाचार-पत्रों के
माध्यम से उन्होंने भारतीयों में पूर्ण स्वतंत्रता की चेतना जगाई। उनके
क्रांतिकारी विचारों और निर्भीक राष्ट्रवाद से भयभीत होकर ब्रिटिश शासन ने उन्हें
"भारत का सबसे खतरनाक व्यक्ति" कहा। श्रीअरविंद के तीन
"पागलपन" थे— अपनी समस्त प्रतिभा और संपत्ति ईश्वर को समर्पित करना, ईश्वर का प्रत्यक्ष साक्षात्कार करना, तथा भारत माता को दिव्य माता मानकर उनकी
निःस्वार्थ सेवा और मुक्ति के लिए जीवन अर्पित करना। (उत्तरयोगी श्री अरविन्द -
शिव प्रसाद सिंह पृष्ठ 79)
श्रीअरविंद का एक महत्वपूर्ण योगदान निष्क्रिय प्रतिरोध (Passive Resistance) का सिद्धांत था। CWSA खंड 06-07
पृष्ट 263) उन्होंने स्वदेशी, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा और असहयोग को विदेशी शासन के
विरुद्ध प्रभावी साधन बताया। बाद में यही सिद्धांत भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के
प्रमुख आधार बने। यद्यपि 1910 के बाद उन्होंने सक्रिय राजनीति से स्वयं को
अलग कर आध्यात्मिक साधना का मार्ग अपनाया, फिर
भी उनके राजनीतिक विचारों ने आने वाली पीढ़ियों को निरंतर प्रेरित किया।
अलीपुर बम षड्यंत्र मुकदमा उनके जीवन का निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ।
लगभग एक वर्ष के कारावास के दौरान उन्हें गहन आध्यात्मिक अनुभूतियाँ हुईं, जिन्होंने उनके जीवन की दिशा बदल दी। मुकदमे से
बरी होने के बाद उन्होंने 1909 में ऐतिहासिक उत्तरपाड़ा भाषण दिया। इस भाषण
में उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत की स्वतंत्रता केवल राजनीतिक उद्देश्य नहीं है, बल्कि उसका संबंध भारत के आध्यात्मिक दायित्व
से भी है। उन्होंने सनातन धर्म को किसी संकीर्ण संप्रदाय का धर्म नहीं, बल्कि समस्त मानवता के लिए एक शाश्वत और
सार्वभौमिक जीवन-दर्शन बताया। आज भी उत्तरपाड़ा भाषण सनातन धर्म की सबसे सरल और
गहन व्याख्याओं में से एक माना जाता है।(CWSA खंड
8 पृष्ठ 3)
श्रीअरविंद केवल राष्ट्रवादी नेता ही नहीं, बल्कि महान कवि, दार्शनिक और आध्यात्मिक चिंतक भी थे। उनका महाकाव्य 'सावित्री' आधुनिक
युग का "वेद" माना जाता है। यह केवल साहित्यिक कृति नहीं, बल्कि मानव आत्मा की अज्ञान से ज्ञान, मृत्यु से अमरत्व और सीमितता से दिव्यता की
यात्रा का आध्यात्मिक महाकाव्य है। उनकी प्रसिद्ध दार्शनिक कृति 'द लाइफ डिवाइन' (The Life Divine) में मानवता के भविष्य के लिए सुप्रामेंटल
परिवर्तन (Supramental
Transformation) का
सिद्धांत प्रस्तुत किया गया है। उनके अनुसार मनुष्य विकास की अंतिम अवस्था नहीं है; मानव चेतना का और भी उच्च विकास संभव है, जो वर्तमान वैश्विक संकटों का स्थायी समाधान
प्रदान कर सकता है।
भारत की स्वतंत्रता के दिन, 15
अगस्त 1947, श्रीअरविंद ने अपना प्रसिद्ध स्वतंत्रता संदेश
दिया, जिसे उनके "पाँच स्वप्न (Five Dreams)" के नाम से जाना जाता है। इन पाँच स्वप्नों में
भारत की पूर्ण एकता, एशिया का पुनर्जागरण, विश्व संघ की स्थापना, मानवता के लिए भारत का आध्यात्मिक योगदान तथा
उच्चतर मानव चेतना का विकास सम्मिलित था। आज भी उनका यह संदेश विश्व शांति, सहयोग और मानव कल्याण के लिए अत्यंत प्रासंगिक
है।( CWSA खंड 36
पृष्ठ 474)
श्रीअरविंद का आध्यात्मिक राष्ट्रवाद (Spiritual Nationalism) उनकी मौलिक देन है। उनके अनुसार सच्चा
राष्ट्रवाद कभी भी संकीर्णता, घृणा
या विस्तारवाद का समर्थक नहीं हो सकता। प्रत्येक राष्ट्र का मानवता की उन्नति में
एक विशिष्ट योगदान होता है। भारत का दायित्व अपनी आध्यात्मिक परंपरा के माध्यम से
विश्व को शांति, सह-अस्तित्व और मानव एकता का संदेश देना है। इस
प्रकार उनका राष्ट्रवाद अंततः अंतरराष्ट्रीयता और विश्व-बंधुत्व का आधार बन जाता
है।
उनकी इसी महान दृष्टि को मूर्त रूप देने के लिए ऑरोविल (Auroville) की स्थापना की गई, जहाँ विभिन्न देशों, धर्मों और संस्कृतियों के लोग मानव एकता की
भावना के साथ रहते हैं। श्रीअरविंद के इस आदर्श को संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा
अनेक अवसरों पर समर्थन और मान्यता प्राप्त हुई, जो
उनकी वैश्विक प्रासंगिकता का प्रमाण है।
श्रीअरविंद का जीवन केवल भारत के स्वतंत्रता संग्राम तक सीमित नहीं
है। वे एक महान क्रांतिकारी, दूरदर्शी
राष्ट्रवादी, अद्वितीय दार्शनिक, महाकवि और आध्यात्मिक महर्षि थे। उन्होंने
सिखाया कि राजनीतिक स्वतंत्रता तभी सार्थक है जब उसके साथ नैतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक उत्थान भी हो। जैसा
कि देशबंधु सी. आर. दास ने कहा था, श्रीअरविंद
इतिहास में सदैव "देशभक्ति के कवि, राष्ट्रवाद
के पैगम्बर और मानवता के प्रेमी" के रूप में स्मरण किए जाएंगे। इसलिए
प्रत्येक 15 अगस्त को जब भारत अपना स्वतंत्रता दिवस मनाता
है, तब वह उस महान ऋषि को भी श्रद्धापूर्वक नमन
करता है, जिसने स्वतंत्र भारत ही नहीं, बल्कि समस्त मानवता के उज्ज्वल भविष्य का
स्वप्न देखा।
सूर्य
प्रताप
सिंह
राजावत
उपाध्यक्ष श्री
अरविन्द
सोसाइटी
राजस्थान
A 35
JAI AMBEY NAGAR TONK ROAD JAIPUR 302018
9462294899
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