संविधान और संविधान सभा में भारतीय विरासत

 

संविधान और  संविधान सभा  में भारतीय विरासत

संविधान सभा में बहस के समय वेद, पुराण , उपनिषद, रामायण , महाभारत , स्मृतियों, , शंकराचार्य, तुलसीदास , सूरदास,  स्वामी विवेकानंद,महर्षि अरविंद , आदि का स्मरण किया गया था | स्वतंत्रता  (liberty) , समानता   (equality),   बंधुत्व (fraternity) , न्याय (justice) शब्द भाषा की दृष्टि से नए हो सकते  हैं परन्तु भारतीय परंपरा और राजनीती में न्याय, समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व का उल्लेख मिलता है | संविधान सभा की चर्चा इस पक्ष को समझने में सार्थक है | उद्देश्य संकल्प (objective resolution )से लेकर अंतिम वाचन (third reading )तक स्पष्ट होता है कि भारतीय विधि शास्त्र , शासन के सिद्धांत समृद्ध है , युगधर्म के अनुसार संस्थाओं का निर्माण वैदिक  ज्ञान -आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः के  अनुसार    ही किया है  |गणतंत्र के 76 वर्ष को इमानदारी से समझने के लिए संविधान सभा की डिबेट्स का अध्यन अपरिहार्य है |जिससे हम भारत के लोग समझ सके कि संविधान सभा की अभीप्सा , लक्ष्य और भावना को संविधान ने कितना सहयोग दिया है और नागरिको की कितनी सार्थक  भागीदारी रही | कुछ निम्निखित  उदाहरणों से  प्रयास है संविधान, और  संविधान सभा  में भारतीय विरासत  को समझने का  -

20 जनवरी 1947 (उद्देश्य संकल्प Objective Resolution-प्राचीन भारत में गणतंत्र व्यवस्था ) डॉ. राधा कृष्णन - "जब उत्तर से कुछ व्यापारी दक्षिण की ओर गए, तो दक्कन के राजकुमारों में से एक ने सवाल पूछा। "आपका राजा कौन है?" जवाब था , "हममें से कुछ सभाओं द्वारा शासित होते हैं, कुछ राजाओं द्वारा।" केसीड देसो गणाधिना केसीड राजाधीना।

पाणिनि, मेगस्थनीज और कौटिल्य प्राचीन भारत के गणराज्यों का उल्लेख करते हैं। महान बुद्ध कपिलवस्तु गणराज्य के थे। लोगों की संप्रभुता के बारे में बहुत कुछ कहा गया है। हमने माना है कि अंतिम संप्रभुता नैतिक कानून, मानवता की अंतरात्मा पर निर्भर है। प्रजा और राजा दोनों उसके अधीन हैं। धर्म, राजाओं का राजा है। धर्मं क्षात्रस्य क्षत्रम्। यह जनता और स्वयं शासक दोनों का शासक है। यह कानून की संप्रभुता है जिसका हमने दावा किया है।"

21 जनवरी1947 (उद्देश्य संकल्प Objective Resolution  ) श्री आर.वी. धुलेकर –“एक हजार साल पहले, भारत, किसी कारण से , विकेन्द्रीकृत या विभाजित और विदेशियों के आक्रमणों का सामना करने में असफल रहने पर वे उनके प्रभुत्व में आ गए । उसी समय से भारतीय जनता के हृदय में स्वतन्त्रता की अग्नि निरन्तर धधक रही है। यह कभी ख़त्म नहीं हुआ. एक ओर यह अग्नि ऋषियों के रूप में प्रकट हुई। स्वामी रामदास ,  गोस्वामी तुलसीदास , गुरु नानक, स्वामी दयानंद , राम कृष्ण परमहंस , स्वामी  विवेकानन्द और राम तीरथ इसी अग्नि के प्रतीक हैं। दूसरी ओर, शिवाजी , गुरु गोविंद सिंह, राणा जैसे राजनेता और राजनेता झाँसी की प्रताप रानी, रानी लक्ष्मी बाई , राजा राम मोहन राय, लोकमान्य तिलक , मोतीलाल नेहरू और सुभाष चन्द्र बोस भी इसी अग्नि के राजनीतिक प्रतीक थे।महात्मा गांधी और खान अब्दुल गफ्फार खान दोनों संत और राजनीतिज्ञ हैं। बाबर, हुमायूं और अकबर पर भारतीयों का उस हद तक स्वागत था , जिस हद तक वे खुद को भारत से जोड़ते थे । भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान एक भी दिन ऐसा नहीं बीता जब किसी भारतीय को आजादी के उत्साह के लिए जेल में यातनाएं न दी गई हों । आज़ादी की लड़ाई पिछले दो सौ वर्षों से लगातार चल रही है। … 1940-52 के राष्ट्रीय आन्दोलन तथा हाल के महायुद्ध से उत्पन्न अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थिति ने इंग्लैण्ड को भारत छोड़ने के लिये बाध्य कर दिया। यह संविधान सभा उस शक्ति का प्रतिनिधित्व करती है जो अंग्रेजों से जबरन छीनी गई है। यह उनका उपहार नहीं हैl”

28अगस्त1947(अनुसूचित जातियां)श्री उपेन्द्र नाथ बर्मन –"मैं निवेदन करता हूं कि हम , अनुसूचित जातियां, न केवल बाहर से बल्कि कांग्रेस के सदस्य के रूप में इस संविधान-निर्माण में पूरे दिल से शामिल हुए हैं, क्योंकि हम जानते हैं कि हमारी निर्भरता की इस अवधि के दौरान हमारी जो भी कमियां रही हों, चाहे जो भी अपराध हमने किये हों । हमारे दुर्भाग्यपूर्ण समय के दौरान, हमारे बीच, विशेष रूप से बंगाल में,स्वामी  विवेकानन्द और रवीन्द्रनाथ टैगोर जैसे पुरुष पैदा हुए थे, जिन्होंने हमारे अंदर भारत के कायाकल्प की आस्था और आशा को प्रेरित किया। अब, इस संविधान सभा में भाग लेने के दौरान और विभिन्न समितियों से मुझे यह विश्वास हो गया है कि आख़िरकार भारत की प्रतिभा ने ज़रूरत की घड़ी में उनको  नहीं छोड़ा है।”

27 दिसम्बर 1948(ईश्वर  के नाम में शपथ म )श्री एच.वी. कामथ-" मैं सदन से अपील करूंगा कि हम एक अमर और एक आध्यात्मिक विरासत के उत्तराधिकारी हैं, एक ऐसी विरासत जो न भौतिक है, न ही लौकिक: एक विरासत जो अध्यात्मिक  है , जो शाश्वत है। आइए हम इस अमूल्य विरासत को बर्बाद न करें। आइए हम इस विरासत को नष्ट न करें: आइए हम अपनी प्राचीन विरासत, अपनी आध्यात्मिक प्रतिभा के प्रति सच्चे रहें। आइए हम उस मशाल को हल्के में न लें जो सौंपी गई है आइए हम स्वामी विवेकानन्द के शब्दों में आध्यात्मिक रूप से दुनिया पर विजय पाने की आकांक्षा रखें। आइए हम एक ऐसी राह बनाएं जो तब तक दुनिया की रोशनी बनी रहेगी जब तक सूर्य , चंद्रमा और सितारे बने रहेंगे।''

25 नवंबर1948 (विश्व में  भारत की भूमिका और अंतर्राष्ट्रीय शांति)प्रो. बीएच खारदेकर-"भारत का मिशन शांति का मिशन है। राम  तीर्थ और स्वामी  विवेकानन्द से लेकर टैगोर और गांधीजी तक , अगर उन्होंने कुछ किया है, तो उसे बहुत मजबूत किया है। पूरे इतिहास में, ऐसा इसलिए नहीं है कि हम कमजोर रहे हैं, बल्कि इसलिए कि यह हमारे खून में रहा है कि हम शांति के इस मिशन को आगे बढ़ा रहे हैं। अहिंसा हर भारतीय की मिट्टी और दिल में है। यह कोई नई बात नहीं हैl यह  हमारे इतिहास , हमारी परंपरा, हमारी संस्कृति के अनुरूप है कि हम शांति का देश हैं और हम यह देखना चाहते हैं कि दुनिया में शांति बनी रहे।"   इसी विचार को  23 नवम्बर 1949 को श्री आर.वी. धुलेकर ने कहा था कि    स्वामी विवेकानन्द  भारत के बाहर तलवार के मिशन के साथ नहीं, बल्कि शांति के मिशन के साथ गए थे।"

29 नवम्बर1948(अस्पृश्यता निषेध)डॉ. मोनोमोहन दास –"न केवल महात्मा गांधी, बल्कि इस प्राचीन भूमि के अन्य महापुरुषों और दार्शनिकों, स्वामी विवेकानन्द , राजा राम मोहन राय, रवीन्द्रनाथ टैगोर और अन्य जिन्होंने इस( अस्पृश्यता) घृणित प्रथा के खिलाफ अथक संघर्ष किया, उन्हें भी आज यह देखकर बहुत खुशी होगी स्वतंत्र भारत ने, स्वतंत्र भारत ने अंततः भारतीय समाज के शरीर पर इस घातक घाव को दूर कर दिया है। एक हिंदू के रूप में, मैं आत्मा की अमरता में विश्वास करता हूं। इन महापुरुषों की आत्माएं, लेकिन जिनकी भक्ति और जीवन के लिए- लंबे समय से सेवारत भारत वह नहीं होता जो वह आज है, इस समय अस्पृश्यता की इस घृणित प्रथा को दूर करने के हमारे साहस और साहस पर हम पर मुस्कुरा रहा होता।"

5 नवम्बर1948 (ग्राम पंचायत)श्री एच.वी. कामथ – “मुझे नहीं पता कि उन्होंने श्रीअरविंद द्वारा लिखित "द स्पिरिट एंड फॉर्म ऑफ इंडियन पॉलिटी" की  किताब पढ़ी है या नहीं, । इन किताबों से हमें पता चलता है कि प्राचीन काल में हमारी राजनीति किस तरह से स्वायत्त और आत्मनिर्भर ग्राम समुदायों पर आधारित थी; और यही कारण है कि हमारी सभ्यता इतने युगों से बची हुई है। अगर हम अपनी राजनीति की ताकत को भूल जाते हैं तो हम सब कुछ खो देते हैं।“

6 दिसम्बर 1948 (धर्म religion पर चर्चा) श्री एच.वी. कामथ-“इस शब्द 'धर्म' के वास्तविक अर्थ पर आते हुए, मैं दृढ़तापूर्वक कहता हूँ कि 'धर्म' का सबसे व्यापक अर्थ धर्म या उसकी आत्मा के सच्चे मूल्यों से लगाया जाना चाहिए। 'धर्म', जिसे हमने अपनी संविधान सभा के शिखा या मुहर में अपनाया है और जिसे आप हमारी बहसों की मुद्रित कार्यवाही में पाएंगे: ("धर्म चक्र प्रवर्तनाय") - श्रीमान, मेरे विचार से, उस भावना को भारतीय संघ के नागरिकों में समाहित किया जाना चाहिए। योग पर चर्चा के समय कामथ ने कहा कि महायोगी श्रीअरविंद ने बार-बार कहा है कि आज सबसे बड़ी आवश्यकता चेतना का रूपांतरण, योग के अनुशासन के माध्यम से मानवता का उच्च स्तर तक उत्थान है।”

6दिसम्बर1948(धर्म–religion पर चर्चा)पंडित लक्ष्मीकांत मैत्र- "महान स्वामी विवेकानन्द कहते थे कि भारत अपनी समृद्ध आध्यात्मिक विरासत के कारण पूरी दुनिया में आदर और सम्मान का पात्र है। पश्चिमी दुनिया, भौतिकवादी सभ्यता की सारी ताकत से मजबूत , विज्ञान की उपलब्धियों से समृद्ध, प्रभुत्वशाली स्थिति रखती है विश्व आज आध्यात्मिक खजाने के अभाव के कारण गरीब है। और अब भारत ने इसमें कदम रखा है। भारत को इस समृद्ध आध्यात्मिक खजाने , अपने इस संदेश को पश्चिम से आयात करना होगा। यदि हमें ऐसा करना है, यदि हम हैं दुनिया को शिक्षित करने के लिए, अगर हमें भारत की संस्कृति और विरासत के बारे में दुनिया में व्याप्त संदेह और गलत धारणाओं और भारी अज्ञानता को दूर करना है, तो यह अधिकार अंतर्निहित होना चाहिए, - अपने धार्मिक विश्वास को मानने और प्रचारित करने का अधिकार स्वीकार किया जाना चाहिए। "

19नवम्बर1949(आध्यात्मिक विरासत -तृतीय वाचन )श्री एचवी कामथ-" हम भारत के लोग , अपनी आध्यात्मिक प्रतिभा और अपनी प्राचीन परम्पराओं  को नहीं भूलेंगे। यह स्वामी विवेकानन्द ही थे जिन्होंने कहा था कि जिस दिन भारत भगवान को भूल जाता है, उसी दिन वह आध्यात्मिकता को भी भूल जाता है  ,जिस  दिन आध्यात्मिकता मर जाएगी, उस दिन भारत भूमि   दुनिया में एक ताकत बनना बंद कर देगी । मुझे आशा है कि हम इस तथ्य के बावजूद अपनी परंपराओं को जीवित रखेंगे कि हम प्रस्तावना में भगवान के नाम का आह्वान करना भूल गए। हम इस संविधान को दैवीय मार्गदर्शन की भावना से , दैवीय कृपा और आशीर्वाद के तहत काम करें। ….स्वामी विवेकानन्द ने भारत को आगे बढ़ने का आह्वान किया और वेदान्त का जाप किया मन्त्रम् ।

उत्तिष्ठता जगराता प्राप्य वरानमिबोधता

जागो, उठो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए"

17नवम्बर1949 (प्रिएम्बल -तृतीय वाचन )सेठ गोविंद दास - इस प्रिएम्बल में हमने स्पष्ट कर दिया है कि  न्याय का प्रथम स्थान रहना सर्वथा उचित है। हमारे देश में सदा न्याय को ही प्रथम स्थान प्राप्त रहा है। यदि हम अपने प्राचीन इतिहास को देखें उस इतिहास की परम्परा को देखें तो हमें ज्ञात होगा कि इस देश में न्याय का प्रथम स्थान था। हमारे यहां कहा गया हैः'स्वस्ति प्रजाभ्यः परिपालयन्तां न्यायेन मार्गेण महीं महीशाः ̧अर्थात् शासक न्याय मार्ग से प्रजा का पालन करें।

 addition 

20  जनवरी , 1947( उद्देश्य संकल्प Objective Resolution -  मानवीय आदर्श - समानता, बंधुत्व और भाईचारा और ऋग्वेद ) श्री अलगू राज शास्त्री:

इस उद्देश्य संकल्पमें सभी युगों के मानवीय आदर्श - समानता, बंधुत्व और भाईचारा - सन्निहित हैं। ऋग्वेद के आठवें 'मंडल' में एक सूक्त है जिसमें कहा गया है: "सभी मनुष्य समान हैं। राजा को अपनी प्रजा के प्रति वैसा ही सम्मान रखना चाहिए जैसा एक माँ अपने पुत्रों के प्रति रखती है।" मुझे खुशी है कि ऐसे सभी उच्च आदर्श, जो हमें युगों से सिखाए गए हैं, उद्देश्य संकल्प में प्रतिपादित किए गए हैं और इसलिए मैं इसका समर्थन करने के लिए यहाँ हूँ। प्रस्ताव में एक ऐसे राज्य की कल्पना की गई है जहाँ भोजन और कपड़े की कोई कमी नहीं है और वितरण समान है। 'भागवत' में परिकल्पित राज्य के सभी आदर्श प्रस्ताव में सन्निहित हैं। 'भागवत' कहता है कि अपने लोगों को उनकी सभी आवश्यकताओं को प्रदान करना राज्य का पवित्र कर्तव्य है: अन्नादेह समुइभागः प्रजानाम यथाहिताः। ...हम 'ऋग्वेद' में वर्णित उच्च मानवीय आदर्शों पर चलने का प्रयास करेंगे- देवाहितं यदायुः। हमारा शक्तिशाली, उन्नत और समृद्ध राज्य अपने कल्याण के लिए अस्तित्व में नहीं रहेगा; बल्कि यह अपने सभी संसाधनों का उपयोग विश्व के कल्याण के लिए करेगा। उद्देश्य संकल्प हमारे सामने एक बहुत ही महान आदर्श रखता है।

…. उद्देश्य संकल्प में निहित दृढ़ संकल्प 'ऋग्वेद' में वर्णित प्राचीन उच्च आदर्शों के अनुरूप है - इन्द्रस्त्वा भिरक्षतु। कोई भी राज्य, अपनी स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद भी, जीवित नहीं रह सकता और अपनी रक्षा नहीं कर सकता यदि वह सैन्य शक्ति में कमजोर है।

 

 

 

 

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