कोरोना महामारी में व्यक्तिगत एवं सामूहिक दायित्व

                                  

 कोरोना महामारी में व्यक्तिगत एवं सामूहिक दायित्व
आजकल कोरोना वायरस से सम्बन्धित वैज्ञानिकऐतिहासिकसामाजिकधार्मिक और आध्यात्मिक पहलुओं पर सोश्यल मीडिया में चर्चा का विषय बना हुआ हैइन सभी पक्षों को पढ़कर किसी भी व्यक्ति को यह निर्णय लेने में कठिनाई हो रही है कि किस पहलु को प्राथमिकता देवें। यह प्रश्न मेरे सामने भी है। वैज्ञानिक पहलु है जिसको आधार बनाकर सभी देशों की सरकारों  अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाऐं दिशा-निर्देश जारी कर रही है। सभी से अपेक्षा की जाती है। दिशा-निर्देशों की पालना सभी सुनिश्चित करें। भारत में सभी नागरिकों से यह अपेक्षा एक स्वाभाविक प्रक्रिया है।भारत में आध्यात्मिक ज्ञान की कमी नहीं है। भारत में मनुष्य की संरचना में शरीर को नश्वर एवं आत्मा को अनश्वर माना गया है एवं आध्यात्मिक दृष्टि से अलग-अलग ऋषियों एवं शास्त्रों को उदृत कर साधकों एवं योग मार्ग पर चल रहे जिज्ञासुओं को यह समझा जा रहा है कि आत्मनिष्ठआत्मावान एवं योगयुक्त मनुष्यों को कोरोना जैसी महामारी से डरने की आवश्यकता नहींक्योंकि कोरोना जैसे वायरस योगपथ पर उन्हीं पर आक्रमण करते हैजो कि भय से ग्रसित हैईश्वर में आस्था एवं विश्वास रखने वालों को ऐसे वायरस से घबराने की आवश्यकता नहीं। यह आध्यात्मिक सत्य है। इससे इंकार नहीं किया जा सकता। व्यक्तिगत रूप से सभी साधक योगयुक्तभय से मुक्त एवं ईश्वर में पूर्ण आस्था रखते हुए वायरस के आक्रमण से बच सकते है। यह सिद्धांत आध्यात्मिक समूह पर भी लागू होता है। इसमें कोई  तो भ्रम है  ही इससे इंकार किया जा सकता है। समग्रता से श्रीमद्भागवतगीता के अध्यन करने पर यह निष्कर्ष निकलता है कि लोक संग्रह (अध्याय 3.20) को देखते हुए कर्म करने को ही योग्य एवं उचित बताया हैश्रेष्ठ पुरूष के आचरण (अध्याय 3.21) के प्रभाव के बारे में गीता कहती है कि श्रेष्ठ पुरूष जो-जो आचरण करता है अन्य पुरूष भी वैसा ही आचरण करते है.वे जो कुछ प्रमाण कर देता है समस्त मनुष्य समुदाय उसी की तरह जीवन जीने की कोशिश करता हैभारत की सरकार द्वारा वायरस से बचने के लिए सभी से अपील की गई है एवं सभी राज्य सरकारें भी वायरस के कारण पैदा हुई स्थिति को देखते हुए महामारी की घोषणा कर चुकी है। नागरिकों द्वारा उक्त दिशा-निर्देशों की पालना नहीं करना गलत उदाहरण एवं गलत संदेश बनता है। व्यक्तिगत एवं आंतरिक रूप से आध्यात्मिक सिद्धांतों की पालना करते हुए सभी आध्यात्मिक संस्थाओं को राष्ट्रीय एवं राज्य सरकार द्वारा जारी निर्देशों की पालना में आचरण करना चाहिए - 1. अपने हाथों को अच्छी तरह साबुन से धोएं। अगर साबुन ना हो तो सैनिटाइज़र का इस्तेमाल करें, 2. अपनी नाक और मुंह को ढक करक रखें, 3. बीमार लोगों से दूरी बना रखें। उनके बर्तन का इस्तेमाल ना करें और उन्हें छुए भी नहीं। इससे मरीज़ और आप दोनों ही सुरक्षित रहेंगे, 4. घर को साफ रखें और बाहर से आने वाली चीज़ों को भी साफ करके ही घर में लाएं, 5. नॉन वेज खासकर सी-फूड खाने से बचेंक्योंकि कोरोना वायरल सी-फूड से ही फैला है।
यह  केवल इन परिस्थितियों में राष्ट्रधर्म है बल्कि आज का युग धर्म भी है।
सूर्य प्रताप सिंह राजावत

Comments

Popular posts from this blog

Dr. Syama Prasad Mookerjee on Hindi-National Language discussion in Constituent Assembly

Motto of Supreme Court of India -यतो धर्मस्ततो जयः