समस्त जीवन योग है- श्रीअरविन्द (अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस)

 

समस्त जीवन योग है- श्रीअरविन्द

योग की  व्यापक लोकप्रियता को देखते हुए, 11 दिसंबर 2014 को संयुक्त राष्ट्र ने प्रस्ताव 69/131 के ज़रिए 21 जून को 'अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस' घोषित किया। इस साल 2026 में  12वां अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया जा रहा है, जिसकी थीम है "स्वस्थ बुढ़ापे के लिए योग" (Yoga for Healthy Ageing).

योग की अलग-अलग पद्धतियाँ योग सीखने वाले के मन में एक बुनियादी सवाल खड़ा करती हैं: कौन सा योग सबसे अच्छा है? क्या योग के अलग-अलग रास्तों के तरीके एक-दूसरे के विरोधी हैं?क्या योग को अपनाने और उसका अभ्यास करने का कोई खास क्रम है? आम तौर पर, आज के ज़्यादातर टीकाकार यह कहने के लिए गीता का सहारा लेते हैं कि कर्म योग ही गीता का अंतिम संदेश है। लेकिन श्रीअरविन्द अपनी किताब "एसेज ऑन गीता" (Essays on Gita) में कर्म योग, ज्ञान योग और भक्ति योग के मेल की बात करते हैं। उनका कहना है कि ये एक-दूसरे से अलग या विरोधी नहीं हैं, बल्कि योग की यात्रा में इन सभी का अपना सही स्थान है। श्रीअरविन्द लिखते हैं कि कर्म योग पहला कदम है और ज्ञान योग दूसरा, लेकिन कर्म योग जारी रहता है। दूसरे चरण में ये दोनों साथ-साथ चलते हैं। भक्ति योग का आखिरी चरण वह है जहाँ दो रास्ते मिलकर निस्वार्थ कर्म, आत्म-साक्षात्कार और परमेश्वर की भक्ति का एक मिला-जुला रूप बन जाते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि इंसान को ईश्वर से मिलन और परम दिव्य स्वरूप के साथ एक होने का फल मिलता है।

पारंपरिक रूप से इंसान और योग के रिश्ते के बारे में कहा जाता है कि अगर इंसान ईश्वर को पा लेता है, तो वह दुनियावी ज़िंदगी खो देता है; या अगर वह दुनिया को जीतने की कोशिश करता है, तो उसके ईश्वर को खोने का खतरा रहता है। इंसान की भूमिका और अस्तित्व के बारे में श्रीअरविन्द एक नया नज़रिया पेश करते हैं। वे लिखते हैं कि प्रकृति के विकास की प्रक्रिया में इंसान एक ऐसी संभावना का प्रतिनिधित्व करता है जहाँ निचली प्रकृति खुद को उच्च प्रकृति में बदल सकती है, और उसके बाद उच्च प्रकृति निचले रूपों में प्रकट हो सकती है। श्रीअरविन्द द्वारा बताए गए 'पूर्ण योग' (Integral Yoga) - जिसे 'रूपांतरण का योग' या 'सुप्रामेंटल योग' भी कहा जाता है - में मुक्ति और पूर्णता शामिल है। इसमें शरीर, प्राण और मन जैसे साधनों के ज़रिए अपनी क्षमताओं को ज़ाहिर करते हुए भी ईश्वर से संपर्क नहीं टूटता, और 'पूर्ण योग' की यात्रा में “चैत्य पुरुष ' (psychic) ​​लगातार मार्गदर्शक का काम करता  है।

 “योग समन्वय” में श्रीअरविंद लिखते हैं   कि  जीवन और योग दोनो को यथार्थ दृष्टिकोण से देखे तो सम्पूर्ण जीवन ही चेतन या अवचेतन रूप में योग है। जीवन के बाह्य रूपों के पीछे प्रकृति का योग दिखाई देता है। अभिव्यक्ति के द्वारा प्रकृति स्वयं की पूर्णता प्राप्त करने की तथा अपनी मूल दिव्य सत्ता के साथ एक होने की चेष्ठा कर रही है।मनुष्य प्रकृति का विचारशील प्राणी है, वह स्वचेतना के साधन से इसी प्रक्रिया को द्रूत वेग से पूरा कर सकता है।   अतः इसी को स्पष्ट करते हुए स्वामी विवेकानन्द कहते है ‘‘योग एक ऐसा साधन है जो व्यक्ति के क्रम विकास को शारीरिक जीवन के अस्तित्व के एक जीवन काल या कुछ वर्षों में यहाँ तक कि कुछ महीनों में ही साधित कर दे।’’

श्रीअरविन्द के अनुसार योग गुह्य और असामान्य वस्तु नहीं है।योगिक पद्धतियों और वैज्ञानिक प्रयोगों में कोई अंतर नहीं होता ।  जिस प्रकार विद्युत और भाप से प्रकृति को नियंत्रित किया जा सकता है उसी प्रकार योगिक पद्धतियाँ  पूर्णतः वैज्ञानिक होती है  । राजयोग में इस अनुसंधान और अनुभव पर आधारित है कि हमारी आंतरिक शक्तियों को अलग किया जा सकता है  उन्हें नए सिरे से मिलाया जा सकता है  फिर उनसे ऐसे नए कार्य कराए जा सकते हैं जो पहले असंभव माने जाते थे  । इसी प्रकार हठयोग इस बोध और परीक्षण पर निर्भर करता है कि जिन प्राणिक शक्तियों और क्रियाओं के अधीन हमारा सामान्य जीवन प्रभावित रहता है । उस प्राणशक्ति को वश में किया जा सकता है, बदला जा सकता है । इस सब के ऐसे परिणाम निकलते हैं जो पहले संभव नहीं थे । साधारण लोग इस प्रक्रिया को समझ नहीं पाते और उन्हें सब कुछ चमत्कार पूर्ण प्रतीत होता है ।  विज्ञान की प्रगति और विविध लाभ मानव को विजेता होने का भ्रम पैदा करते हैं , जो हमारे जीवन को यंत्रवत  बना देती है । हमारी बहुत छोटी सी स्वतंत्रता और स्वामित्व के बदले में हमें मशीनों की दासता  को झेलना पड़ता है । इसी प्रकार योगिक पद्धतियों के विशिष्ट परिणामों में भी हानि और बुराइयां हैं । भारत में प्रचलित योग में जीवन से भागना योग के लिए अपरिहार्य शर्त नहीं बल्कि योग का लक्ष्य बन गया ।

 अतः  श्रीअरविन्द के अनुसार कोई भी योग तब तक अधूरा ही रहेगा जब तक  उसके  लक्ष्य में मुक्त और पूर्ण मानवीय जीवन में भगवान और प्रकृति को पुनर्मिलन नहीं करा लेता ।अतः "योग का सच्चा और पूर्ण उपयोग और उद्देश्य तभी साधित हो सकते है जब मनुष्य के अन्दर सचेतन योग प्रकृति में चल रहे योग की भांति पूरे जीवन में अवचेतन रूप से व्यापक हो जाये"।इस प्रकार मार्ग और उपलब्धि, अथवा लक्ष्य को देख कर सहज ही श्रीअरविन्द लिखते है कि ‘‘समस्त जीवन योग है’’।

सूर्य प्रताप सिंह राजावत ,वाईस चेयरमैन , श्रीअरविंद सोसाइटी राजस्थान 

 

 

 

 

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