भारतीय ज्ञान परंपरा में श्रीअरविन्द का योगदान
भारतीय ज्ञान परंपरा में श्रीअरविन्द का योगदान श्री अरविन्द के दर्शन में पहली बार मनुष्य और उसके पार्थिव जीवन को उसका पूर्ण महत्त्व और सम्मान प्राप्त हुआ है। उन्होंने सबसे पहले स्पष्ट रूप से यह घोषणा की कि मनुष्य इसी पार्थिव जीवन में , इसी भौतिक शरीर में रहते हुए पूर्ण दिव्यता प्राप्त कर सकता है। दिव्यता ऐसी वस्तु नहीं है जिसे मनुष्य केवल अपने मन , जीवन और शरीर से बाहर निकलकर ही प्राप्त कर सकता है। श्री अरविन्द के अनुसार , भौतिक संसार में रहते हुए , शरीर में स्थित रहते हुए और अपने सह-मनुष्यों के साथ व्यवहार करते हुए भी मनुष्य दिव्य मनुष्य बन सकता है। यह केवल सम्भव ही नहीं है , बल्कि यह निश्चित है कि मनुष्य देर-सबेर—और देर से अधिक शीघ्र—दिव्य मनुष्य बनेगा। यहाँ श्री अरविन्द के दर्शन और शंकर तथा उनके मत के महान अद्वैत दर्शन के बीच एक व्यापक अन्तर दिखाई देता है। अद्वैत दर्शन के अनुसार मनुष्य की मुक्ति शरीर , मन और जीवन के साथ सभी प्रकार के सम्बन्ध और आसक्ति को छोड़कर परम सत्य में विलीन होने में है। इस दृष्टि से मुक्ति मुख्यतः व्यक्तिगत उपलब्धि बन जाती है। इसमें आवश्यक रूप ...