भारत में राजभाषा हिन्दी का ऐतिहासिक चिंतन और संविधान सभा का निर्णय
भारत में राजभाषा हिन्दी का ऐतिहासिक चिंतन और संविधान सभा का निर्णय भारत में एक ऐसी भाषा की आवश्यकता का चिंतन , जो विभिन्न भाषायी , सांस्कृतिक और प्रादेशिक समुदायों को परस्पर जोड़ सके , आधुनिक भारतीय राष्ट्रवाद के उदय के साथ ही स्पष्ट रूप से सामने आने लगा था। राष्ट्रभाषा अथवा ऐसी संपर्क-भाषा की कल्पना केवल प्रशासनिक सुविधा का प्रश्न नहीं थी , बल्कि इसे राष्ट्रीय एकता , सांस्कृतिक आत्मबोध और स्वाधीनता की चेतना से भी जोड़ा गया। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध से लेकर संविधान सभा के निर्णय तक इस प्रश्न पर देश के अनेक चिंतकों , साहित्यकारों और राष्ट्रवादियों ने विचार किया। सन् 1874 में आधुनिक भारत के प्रमुख सुधारक केशवचंद्र सेन की पत्रिका ‘ सुलभ समाचार’ में भारत के लिए एक राष्ट्रभाषा की आवश्यकता का विचार दिखाई देता है। इसी वैचारिक क्रम को बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने अपने साहित्य और लेखन के माध्यम से आगे बढ़ाया। आनन्द मठ के रचयिता बंकिमचंद्र के लिए राष्ट्र केवल राजनीतिक इकाई नहीं था ; वह सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रीय आत्मसम्मान से निर्मित एक जीवंत अवधारणा था। भाषा को इस राष्ट्र...